भोपाल एम्स में मेडिकल सप्लाई की कीमतों पर सवाल, ₹14 की ट्यूब ₹943 में खरीदने का दावा

भोपाल एम्स में मेडिकल सप्लाई पर सवाल, ₹14 की ट्यूब ₹943 में खरीदी
भोपाल। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल में दवाओं और मेडिकल उपकरणों की खरीद को लेकर कीमतों में बड़े अंतर का मामला सामने आया है। एक तुलनात्मक समिति की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मेडिकल सामग्री की सप्लाई दरें अन्य अनुबंधित दरों से कई गुना अधिक दर्ज की गईं। रिपोर्ट में 200 सेंटीमीटर की हाई-प्रेशर एक्सटेंशन ट्यूब का उदाहरण दिया गया है, जिसकी एक अनुबंधित दर ₹14.27 बताई गई, जबकि अमृत फार्मेसी की सप्लाई दर ₹943.49 दर्ज की गई।
रिपोर्ट में दवाओं और सर्जिकल सामग्री की कई अन्य वस्तुओं की कीमतों में भी बड़ा अंतर सामने आने की बात कही गई है। इस मामले ने सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में खरीद प्रक्रिया, दरों की समीक्षा और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
एक ट्यूब की दर में ₹929 से अधिक का अंतर
तुलनात्मक रिपोर्ट में हाई-प्रेशर एक्सटेंशन ट्यूब की अनुबंधित दर और सप्लाई दर के बीच ₹929.22 का अंतर दर्ज किया गया। प्रतिशत के हिसाब से यह अंतर करीब 6,512 प्रतिशत बताया गया है।
रिपोर्ट में अन्य दवाओं और मेडिकल सामग्री की दरों में भी अंतर का उल्लेख है। इनमें टेरलिप्रेसिन इंजेक्शन, जेंटामाइसिन इंजेक्शन, एसाइक्लोविर, मेथरजिन, आयरन सुक्रोज और शिशु फीडिंग ट्यूब जैसी वस्तुएं शामिल हैं।
हालांकि, अलग-अलग खरीद दरों की निष्पक्ष तुलना के लिए उत्पाद की विशिष्टता, पैकिंग, मात्रा, आपूर्ति की शर्तों और खरीद की परिस्थितियों का मिलान भी जरूरी होता है। इसलिए इन आंकड़ों के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित खरीद दस्तावेजों और भुगतान रिकॉर्ड की जांच महत्वपूर्ण है।
शिकायतों के बाद बनाई गई थी समिति
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, दवाओं और मेडिकल सामग्री की कीमतों को लेकर शिकायतें सामने आने के बाद तत्कालीन निदेशक प्रो. डॉ. अजय सिंह के निर्देश पर तुलनात्मक जांच की प्रक्रिया शुरू की गई थी। 15 अप्रैल 2025 को समिति गठित हुई और 31 मई 2025 को उसकी रिपोर्ट तैयार की गई।
समिति ने अमृत फार्मेसी की सप्लाई दरों की तुलना एम्स के अन्य सप्लायरों के रेट कॉन्ट्रैक्ट से की थी। रिपोर्ट में कीमतों के अंतर को लेकर सवाल उठाए गए और यह मुद्दा भी सामने आया कि अधिक दरों पर हुई खरीद की वित्तीय समीक्षा की गई या नहीं।
रिपोर्ट को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों को भेजे जाने की जानकारी भी दी गई है। हालांकि, रिपोर्ट में उठाए गए मुद्दों पर जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं बताई गई।
खरीद का बजट ₹145 करोड़ से बढ़कर ₹245 करोड़
एम्स भोपाल की स्थायी वित्त समिति की बैठक में संस्थान के खरीद बजट में हुई वृद्धि का भी उल्लेख किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2022-23 में खरीद बजट ₹145 करोड़ था, जो 2024-25 में बढ़कर ₹245 करोड़ हो गया।
बैठक में अधिकारियों को खर्च कम करने की सलाह दिए जाने की बात सामने आई। रिपोर्ट में यह आशंका भी जताई गई कि यदि दवाओं और मेडिकल सामग्री की खरीद अधिक दरों पर होती है, तो इससे आयुष्मान भारत योजना के निर्धारित पैकेज और जरूरतमंद मरीजों को मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराने के लिए रखे गए बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
बजट में वृद्धि के कारणों और खरीद की दरों के बीच संबंध को स्पष्ट करने के लिए विस्तृत वित्तीय परीक्षण जरूरी होगा।
एम्स प्रबंधन ने बताई आगे की खरीद व्यवस्था
एम्स भोपाल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. विकास गुप्ता के अनुसार, उनके पद संभालने के बाद इस संबंध में केंद्र सरकार की ओर से कोई पत्र प्राप्त नहीं हुआ था। उन्होंने बताया कि अमृत फार्मेसी को एल-1 दरों पर दवाओं और मेडिकल सामग्री की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है।
प्रबंधन के मुताबिक, संस्थान अपने स्तर पर रेट कॉन्ट्रैक्ट भी कर रहा है और अमृत फार्मेसी से खरीद को आपात परिस्थितियों तक सीमित रखने की व्यवस्था की जाएगी।
वहीं, पूर्व मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. शशांक पोरवाल ने इस मामले में वर्तमान अधिकारी से संपर्क करने की बात कही। अमृत फार्मेसी के मध्यप्रदेश प्रभारी नरेंद्र धाकड़ ने रिपोर्ट देखने के बाद ही टिप्पणी करने की बात कही।
मंत्रालय के जवाब का इंतजार
रिपोर्ट में उठाए गए सवालों पर कार्रवाई और जिम्मेदारी तय करने की स्थिति जानने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव विजय नेहरा को ई-मेल भेजे जाने की जानकारी दी गई। रिपोर्ट प्रकाशित होने तक उनका जवाब उपलब्ध नहीं था।
अब मुख्य सवाल यह है कि तुलनात्मक रिपोर्ट में दर्ज दरों के अंतर की विस्तृत समीक्षा होगी या नहीं, खरीद प्रक्रिया में किसी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है या नहीं, और यदि अधिक भुगतान की पुष्टि होती है तो उसके लिए जिम्मेदारी कैसे तय की जाएगी।
फिलहाल, इन सवालों पर अंतिम निष्कर्ष निकालने के लिए संबंधित खरीद रिकॉर्ड, अनुबंध, भुगतान विवरण और आधिकारिक जांच के नतीजों का सामने आना जरूरी है।




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