इंदौर नगर निगम के अधिकारी पर हाईकोर्ट की बड़ी कार्रवाई, अपनी जेब से भरने होंगे ₹1 लाख

इंदौर हाईकोर्ट ने नगर निगम अधिकारी पर लगाया ₹1 लाख का हर्जाना
इंदौर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने नगर निगम के एक अधिकारी पर एक लाख रुपये की कॉस्ट लगाई है। अधिकारी ने बाफना हॉस्पिटल एंड ऑर्थोपेडिक्स रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ उन कानूनी धाराओं के आधार पर आदेश जारी किया था, जिन्हें वर्ष 2020 में ही विलोपित किया जा चुका था। अदालत ने निर्देश दिया कि इस राशि का भुगतान सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि संबंधित अधिकारी से वसूल करके किया जाए।
न्यायमूर्ति संदीप नटवरलाल भट्ट की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि वैधानिक संस्थाओं के अधिकारियों को निर्णय लेते समय लागू कानूनों की जानकारी रखनी चाहिए। गलत कानूनी प्रावधानों के आधार पर आदेश जारी होने से अस्पताल को न्यायालय का रुख करना पड़ा और अदालत का समय भी खर्च हुआ।
क्या है पूरा मामला?
बाफना हॉस्पिटल एंड ऑर्थोपेडिक्स रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड ने इंदौर नगर निगम के 30 सितंबर 2026 के आदेश और उसके आधार पर 7 अक्टूबर को जारी लेजर रिपोर्ट को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल और जयेश गुरनानी ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज मुंशी और अधिवक्ता शशांक श्रीवास्तव उपस्थित हुए।
नगर निगम की ओर से अदालत को बताया गया कि विवादित आदेश प्रथम दृष्टया कानून के अनुरूप नहीं है। निगम ने आदेश और उससे संबंधित लेजर रिपोर्ट को वापस लेने की बात कही।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेश वापस लेने मात्र से संबंधित अधिकारी की गलती को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने मामले में कानूनी प्रावधानों के इस्तेमाल को गंभीर चूक माना।
2020 में विलोपित धाराओं के आधार पर जारी किया था आदेश
हाईकोर्ट के सामने आए मामले में नगर निगम अधिनियम की धारा 143, 146 और 153 का इस्तेमाल करते हुए आदेश जारी किया गया था। अदालत के अनुसार, ये तीनों धाराएं वर्ष 2020 में ही विलोपित की जा चुकी थीं।
इसके बावजूद इन धाराओं के आधार पर अस्पताल के खिलाफ आदेश पारित किया गया। अदालत ने माना कि संबंधित अधिकारी ने मौजूदा कानूनी प्रावधानों की उचित जांच किए बिना आदेश जारी किया। इसके कारण याचिकाकर्ता को अपने अधिकारों के लिए हाईकोर्ट जाना पड़ा।
अदालत ने कहा कि नगर निगम जैसी जिम्मेदार वैधानिक संस्था के अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने अधिकारों का इस्तेमाल प्रचलित कानून के अनुसार करें। कानूनी प्रावधानों की अनदेखी करके आदेश पारित करने से अनावश्यक मुकदमेबाजी की स्थिति पैदा हो सकती है।
₹75 हजार विधिक सेवा प्राधिकरण और ₹25 हजार अस्पताल को मिलेंगे
हाईकोर्ट ने कुल एक लाख रुपये की कॉस्ट के भुगतान का तरीका भी तय किया है। आदेश के अनुसार:
- ₹75,000 मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, इंदौर में जमा किए जाएंगे।
- ₹25,000 बाफना अस्पताल को वाद-व्यय के रूप में दिए जाएंगे।
- राशि का भुगतान आदेश जारी होने की तारीख से सात दिनों के भीतर किया जाना है।
अदालत ने निर्देश दिया कि इस राशि का भार आम जनता या सरकारी खजाने पर नहीं डाला जाए। संबंधित अधिकारी से राशि की वसूली सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी नगर निगम के वरिष्ठ प्रशासनिक स्तर पर रहेगी।
अधिकारियों की जवाबदेही पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकारियों की गलत कार्रवाई के कारण पैदा होने वाली मुकदमेबाजी का आर्थिक बोझ अनावश्यक रूप से सार्वजनिक धन पर नहीं डाला जाना चाहिए। सरकारी संस्थाओं में निर्णय लेते समय लागू कानूनों का पालन करना और कानूनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहना जरूरी है।
इस मामले में नगर निगम ने विवादित आदेश वापस लेने की बात कही, लेकिन अदालत ने इसे पर्याप्त नहीं माना और संबंधित अधिकारी पर व्यक्तिगत रूप से कॉस्ट लगाने का निर्देश दिया।
अब इस मामले में आदेश के अनुपालन और निर्धारित राशि के भुगतान पर नजर रहेगी। अदालत की कार्रवाई सरकारी अधिकारियों के निर्णयों में कानूनी प्रक्रिया के पालन और वित्तीय जवाबदेही के महत्व को रेखांकित करती है।




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