MP में रिश्वत के आरोपी पटवारी पर अभियोजन मंजूरी, 295 भ्रष्टाचार मामलों में अटकी स्वीकृति
भोपाल। मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के बीच अभियोजन स्वीकृति को लेकर बड़ा आंकड़ा सामने आया है। भोपाल के कोलार क्षेत्र में आठ हजार रुपये की रिश्वत लेने के आरोपी पटवारी मंगलेश खंडेलवाल के खिलाफ अभियोजन चलाने की अनुमति जिला प्रशासन ने दे दी है। वहीं, विधानसभा में सामने आई जानकारी के अनुसार लोकायुक्त की जांच पूरी होने के बाद भी 295 भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में अभियोजन स्वीकृति लंबित है।
पटवारी के मामले में भोपाल कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी प्रियंक मिश्रा ने उपलब्ध रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट के आधार पर अभियोजन स्वीकृति जारी की है। दूसरी ओर, लंबित मामलों का आंकड़ा यह बताता है कि लोकायुक्त संगठन की जांच पूरी होने के बाद भी कई प्रकरणों में आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए सक्षम स्तर से अनुमति का इंतजार करना पड़ रहा है।
आठ हजार रुपये की रिश्वत लेने का आरोप
भोपाल के कोलार क्षेत्र में पदस्थ रहे पटवारी मंगलेश खंडेलवाल पर मकान के फर्जी नामांतरण और लीज नवीनीकरण के बदले आठ हजार रुपये की रिश्वत लेने का आरोप है।
मामले में विशेष पुलिस स्थापना लोकायुक्त, भोपाल ने कथित तौर पर उन्हें रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा था। कार्रवाई के बाद मामले की जांच की गई और संबंधित रिकॉर्ड को सक्षम स्तर पर भेजा गया।
जांच रिपोर्ट में सरकारी दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही तथा भ्रष्टाचार संबंधी कृत्य में प्रथम दृष्टया संलिप्तता का उल्लेख किया गया। इसके बाद अब उनके खिलाफ अभियोजन चलाने की अनुमति जारी कर दी गई है।
कलेक्टर ने दी अभियोजन की मंजूरी
पटवारी के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति एसडीएम स्तर से उपलब्ध कराए गए रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट के आधार पर दी गई है।
अभियोजन स्वीकृति मिलने के बाद अब संबंधित जांच एजेंसी के लिए मामले को न्यायिक प्रक्रिया में आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ है। हालांकि, किसी भी आरोपी के खिलाफ आरोप साबित होना न्यायालय की प्रक्रिया का विषय है और अभियोजन स्वीकृति को दोष सिद्धि नहीं माना जा सकता।
295 मामलों में क्यों अटकी है कार्रवाई?
पटवारी के मामले में अभियोजन स्वीकृति मिलने के साथ ही लोकायुक्त के अन्य लंबित प्रकरणों का मुद्दा भी सामने आया है।
विधानसभा में उपलब्ध जानकारी के अनुसार 1 जनवरी 2020 से 21 जून 2026 के बीच लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना ने कुल 1,318 मामलों की विवेचना पूरी की थी। इनमें से 1,302 मामलों में अभियोजन स्वीकृति के लिए सक्षम प्राधिकारियों को प्रस्ताव भेजे गए।
इनमें 985 मामलों में अभियोजन स्वीकृति मिल चुकी थी, जबकि 295 मामले स्वीकृति के इंतजार में बताए गए।
नगरीय विकास एवं आवास विभाग में सबसे ज्यादा मामले
लंबित 295 मामलों में अलग-अलग सरकारी विभागों के अधिकारी और कर्मचारी शामिल हैं। उपलब्ध विभागवार जानकारी के अनुसार सबसे ज्यादा 36 मामले नगरीय विकास एवं आवास विभाग से जुड़े बताए गए हैं।
इसके बाद पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के 15, लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के 12, सामान्य प्रशासन विभाग के 11 और लोक निर्माण विभाग के 10 मामले अभियोजन स्वीकृति के इंतजार में हैं।
राजस्व विभाग के छह और जल संसाधन विभाग के पांच मामले भी इस सूची में शामिल बताए गए हैं।
कई वरिष्ठ अधिकारियों से जुड़े मामले भी लंबित
लंबित मामलों में केवल निचले स्तर के कर्मचारियों के प्रकरण ही शामिल नहीं हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कुछ मामलों में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों से जुड़े प्रकरण भी अभियोजन स्वीकृति के लिए लंबित बताए गए हैं।
इनमें सेवानिवृत्त अधिकारियों तथा विभिन्न पदों पर रह चुके अधिकारियों से संबंधित मामले भी शामिल हैं। इससे अभियोजन स्वीकृति की प्रक्रिया और उसमें लगने वाले समय को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
2026 में भी बड़ी संख्या में मामले जांच के दायरे में
विधानसभा में फरवरी 2026 में दी गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2022-23 से उस समय तक लोकायुक्त संगठन में 1,884 शिकायतें दर्ज हुई थीं, जबकि विशेष पुलिस स्थापना में 1,063 आपराधिक मामले पंजीबद्ध किए गए थे।
इनमें शिकायत एवं जांच शाखा के 1,291 और तकनीकी शाखा के 88 सहित कुल 1,379 मामले जांच के दायरे में बताए गए थे। वहीं 1,063 आपराधिक मामलों में से 393 की विवेचना पूरी हो चुकी थी और 134 मामलों में अभियोजन स्वीकृति लंबित थी।
अभियोजन स्वीकृति क्यों महत्वपूर्ण है?
भ्रष्टाचार के मामलों में सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ जांच पूरी होने के बाद अभियोजन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए कई मामलों में सक्षम प्राधिकारी से अभियोजन स्वीकृति आवश्यक होती है।
लोकायुक्त द्वारा जांच पूरी किए जाने और अभियोजन स्वीकृति मिलने के बीच का यह चरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अनुमति मिलने के बाद ही संबंधित मामले में आगे की न्यायिक कार्रवाई प्रभावी रूप से आगे बढ़ सकती है।
यही वजह है कि 295 मामलों में स्वीकृति लंबित होने का आंकड़ा भ्रष्टाचार के मामलों की कार्रवाई की गति के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एक तरफ कार्रवाई, दूसरी तरफ लंबित मामलों का आंकड़ा
भोपाल के पटवारी के मामले में अभियोजन स्वीकृति जारी होना यह दिखाता है कि संबंधित मामलों में प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की जा रही है। लेकिन इसके साथ ही लोकायुक्त के 295 लंबित मामलों का आंकड़ा यह सवाल भी खड़ा करता है कि जांच पूरी होने के बाद अभियोजन स्वीकृति की प्रक्रिया कितनी तेजी से पूरी हो रही है।
इन मामलों में अलग-अलग विभागों के स्तर पर अनुमति लंबित होने के कारण हर प्रकरण की स्थिति अलग हो सकती है। इसलिए सभी 295 मामलों को एक ही कारण से लंबित मानना उचित नहीं होगा।
अब आगे न्यायिक प्रक्रिया पर नजर
पटवारी मंगलेश खंडेलवाल के मामले में अभियोजन स्वीकृति मिलने के बाद प्रकरण की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। वहीं अन्य 295 मामलों में संबंधित सक्षम प्राधिकारियों से अभियोजन स्वीकृति मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई का रास्ता साफ होगा।
भ्रष्टाचार के मामलों में जांच, अभियोजन स्वीकृति और न्यायालय में सुनवाई—तीनों अलग-अलग चरण हैं। इसलिए जांच में आरोप सामने आना और अदालत में दोष सिद्ध होना एक समान नहीं है। अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।













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