MP High Court: महिला की क्षमता पर सवाल उठाना जेंडर बायस, गंजबासौदा संपत्ति विवाद में फैसला
ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ ने गंजबासौदा के एक पैतृक संपत्ति विवाद से जुड़े मामले में निचली अपीलीय अदालत की उस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें यह माना गया था कि परिवार के बुजुर्ग पुरुष सदस्य किसी कम उम्र की महिला सदस्य पर मुकदमे से जुड़े जरूरी कदम उठाने के लिए निर्भर नहीं हो सकते।
हाईकोर्ट ने इस सोच को लैंगिक पूर्वाग्रह वाला बताते हुए कहा कि किसी महिला की क्षमता के बारे में केवल उसके लिंग और उम्र के आधार पर अनुमान लगाना उचित नहीं है। कोर्ट ने मामले में 18 दिन की देरी से दायर अपील को केवल तकनीकी आधार पर खारिज किए जाने के फैसले को भी रद्द कर दिया और मामले को दोबारा संबंधित अपीलीय अदालत के पास भेज दिया।
पैतृक संपत्ति के हिस्से को लेकर शुरू हुआ था विवाद
मामला विदिशा जिले के गंजबासौदा से जुड़ा है। विवादित संपत्ति को लेकर कानूनी वारिसों की ओर से सिविल मुकदमा दायर किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि संबंधित संपत्ति पैतृक प्रकृति की है और उसमें उनका हिस्सा है।
ट्रायल कोर्ट ने 12 अक्टूबर 2011 को मामले की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं का दावा खारिज कर दिया था। अदालत का निष्कर्ष था कि संपत्ति के पैतृक होने का दावा पर्याप्त रूप से साबित नहीं किया जा सका।
इसके बाद इस फैसले के खिलाफ प्रथम अपील दायर की गई, लेकिन अपील निर्धारित समय सीमा से 18 दिन की देरी से दाखिल हुई। इसी देरी को माफ करने के लिए अदालत के सामने आवेदन दिया गया था।
महिला की बीमारी को बताया गया था देरी का कारण
देरी माफी के आवेदन में बताया गया कि मोहर बाई मामले की कानूनी कार्यवाही देख रही थीं और 25 नवंबर से 12 दिसंबर 2011 के बीच उनकी तबीयत काफी खराब थी। इसी वजह से समय पर अपील दाखिल नहीं हो सकी।
प्रथम अपीलीय अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने बीमारी की प्रकृति से संबंधित दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं होने की बात कही। साथ ही उसने इस बात पर भी सवाल उठाया कि परिवार के अन्य सदस्य उम्र में मोहर बाई से बड़े और पुरुष थे, इसलिए वे एक कम उम्र की महिला पर अपील दाखिल करने के लिए कैसे निर्भर हो सकते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा- महिला की क्षमता पर सवाल उठाना उचित नहीं
मामला जब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा तो जस्टिस अनुराधा शुक्ला की एकल पीठ ने निचली अपीलीय अदालत की इस सोच को कानूनी रूप से सही नहीं माना।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी परिवार के बुजुर्ग पुरुष सदस्य किसी युवा महिला सदस्य पर पारिवारिक मुकदमे से जुड़े जरूरी काम के लिए निर्भर हो सकते हैं। केवल यह मान लेना कि पुरुष सदस्य महिला से सहायता नहीं ले सकते, रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों के आधार पर नहीं था।
कोर्ट ने इसे inherently gender-biased यानी स्वभावतः लैंगिक पूर्वाग्रह वाली सोच बताया और कहा कि ऐसी टिप्पणी महिला सदस्य की क्षमता को कमतर आंकती है।
कोर्ट ने कहा- अनुमान और धारणाओं के आधार पर फैसला नहीं हो सकता
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि प्रथम अपीलीय अदालत की यह धारणा रिकॉर्ड पर उपलब्ध किसी ठोस आधार पर नहीं थी। कोर्ट के अनुसार केवल अनुमान और धारणाओं के आधार पर किसी पक्ष की दलील को खारिज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि यदि देरी के कारण को साबित करने के लिए साक्ष्य की आवश्यकता थी, तो संबंधित पक्षों को साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना चाहिए था।
कोर्ट ने माना कि बिना पर्याप्त अवसर दिए यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं था कि देरी का कारण साबित नहीं हुआ है।
18 दिन की देरी के मामले में हाईकोर्ट ने दिया दोबारा सुनवाई का निर्देश
हाईकोर्ट ने द्वितीय अपील को स्वीकार करते हुए प्रथम अपीलीय अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया। मामले को वापस उसी अदालत में भेजते हुए निर्देश दिया गया कि पक्षकारों को देरी माफी के आवेदन पर साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाए।
इसके बाद अदालत को उपलब्ध तथ्यों और लागू कानून के आधार पर देरी माफी के आवेदन पर नया निर्णय लेना होगा।
यदि 18 दिन की देरी को माफ किया जाता है, तो प्रथम अपीलीय अदालत को मामले की मूल अपील पर भी सुनवाई करके उसके गुण-दोष के आधार पर फैसला करना होगा।
15 अक्टूबर को पक्षकारों को उपस्थित होने का निर्देश
हाईकोर्ट ने मामले में पक्षकारों को 15 अक्टूबर 2026 को प्रथम अपीलीय अदालत के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया है। साथ ही संबंधित रिकॉर्ड को तत्काल वापस भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
महिला की भूमिका को लेकर कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू संपत्ति विवाद का अंतिम फैसला नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में महिला की भूमिका को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणी है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि परिवार के किसी पुरुष सदस्य का किसी महिला सदस्य से कानूनी काम में सहायता लेना उसकी उम्र या लिंग के आधार पर असंभव नहीं माना जा सकता। अदालत ने ऐसी धारणाओं को न्यायिक निर्णय का आधार बनाने पर आपत्ति जताई।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस स्तर पर संपत्ति के वास्तविक अधिकार का अंतिम फैसला नहीं दिया है। अदालत ने मुख्य रूप से 18 दिन की देरी और उसे माफ करने के लिए दिए गए कारणों पर विचार किया तथा मामले को पुनः प्रथम अपीलीय अदालत के पास भेजा है।
हाईकोर्ट के फैसले से क्या स्पष्ट हुआ?
इस मामले में हाईकोर्ट का आदेश तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं को सामने रखता है। पहला, किसी अपील में देरी होने पर उसके कारणों की जांच उचित प्रक्रिया के तहत की जानी चाहिए। दूसरा, यदि किसी तथ्य को साबित करने के लिए साक्ष्य जरूरी है तो पक्षकारों को साक्ष्य देने का अवसर मिलना चाहिए। तीसरा, किसी महिला की क्षमता के संबंध में केवल उम्र और लिंग के आधार पर अनुमान लगाना न्यायिक निर्णय का उचित आधार नहीं हो सकता।
फिलहाल संपत्ति विवाद की मूल अपील पर सुनवाई आगे प्रथम अपीलीय अदालत में होगी। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब पहले 18 दिन की देरी माफ करने के आवेदन पर नए सिरे से विचार किया जाएगा।












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