उज्जैन में 105 साल पुराना फूलडोल समारोह, अखाड़ों के करतब और कृष्ण लीला की झांकियां
उज्जैन। डोल ग्यारस के अवसर पर उज्जैन में बैरवा समाज का 105वां फूलडोल चल समारोह निकाला गया। वर्षों पुरानी इस परंपरा में धार्मिक आस्था के साथ अखाड़ों के शौर्य प्रदर्शन, भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी झांकियां और सामाजिक संदेशों को भी शामिल किया गया। समारोह का शुभारंभ किशनपुरा स्थित बड़े मंदिर से हुआ और समापन अंकपात क्षेत्र के पुरुषोत्तम सागर पर किया गया।
अखाड़ों के प्रदर्शन ने खींचा लोगों का ध्यान
चल समारोह में शामिल अखाड़ों के उस्तादों और युवाओं ने विभिन्न पारंपरिक करतब और शौर्य प्रदर्शन किए। रास्ते में बड़ी संख्या में लोग कार्यक्रम देखने के लिए जमा हुए। अखाड़ों के प्रदर्शन के साथ धार्मिक झांकियां भी जुलूस का प्रमुख आकर्षण रहीं।
खड़े हनुमान और कृष्ण लीला की झांकियां बनीं आकर्षण
फूलडोल में भगवान श्री खड़े हनुमान की झांकी के साथ भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप से जुड़े कई दृश्य प्रस्तुत किए गए। माखन-मटकी प्रसंग, यशोदा के साथ बाल कृष्ण, पूतना वध, पालना झूलते बाल मुकुंद और बाबा महाकाल की भस्म आरती को झांकियों के माध्यम से दर्शाया गया।
इन झांकियों ने समारोह में धार्मिक और सांस्कृतिक रंग को और गहरा किया।
किशनपुरा से पुरुषोत्तम सागर तक निकली शोभायात्रा
फूलडोल चल समारोह किशनपुरा से रवाना होकर शहर के कई प्रमुख मार्गों से गुजरा। जुलूस तीन बत्ती चौराहा, टावर चौक, चामुंडा चौराहा, देवास गेट, मालीपुरा, दौलतगंज, कंठाल चौराहा, गोपाल मंदिर और निजातपुरा होते हुए पुरुषोत्तम सागर पहुंचा।
समारोह के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस और प्रशासन की टीम भी तैनात रही।
सिंहस्थ की तैयारियों की झलक भी दिखाई गई
इस बार समारोह की झांकियों में धार्मिक विषयों के साथ उज्जैन में चल रहे विकास कार्यों और आगामी सिंहस्थ महाकुंभ की तैयारियों को भी प्रदर्शित किया गया। झांकियों में 29 किलोमीटर लंबे घाट, एलिवेटेड ब्रिज और अमृत कलश की प्रतिकृति जैसे विषय शामिल रहे।
इन प्रस्तुतियों के जरिए शहर में प्रस्तावित और चल रहे विभिन्न कार्यों की झलक लोगों के सामने रखी गई।
सामाजिक संदेशों को भी जगह
फूलडोल समारोह केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा। झांकियों में नशामुक्ति, दहेज प्रथा के विरोध और सामाजिक भाईचारे जैसे संदेश भी शामिल किए गए।
टावर चौक पर नगर निगम, सामाजिक संस्थाओं और विभिन्न संगठनों की ओर से अखाड़ों के प्रमुखों का स्वागत किया गया। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले अखाड़ों और झांकियों को सम्मानित भी किया गया।
105 साल पुरानी परंपरा आज भी कायम
ब्रिटिश काल से चली आ रही फूलडोल परंपरा को बैरवा समाज लंबे समय से निभाता आ रहा है। इस अवसर पर समाज की महिलाओं और श्रद्धालुओं द्वारा व्रत रखने तथा सुख-समृद्धि की कामना करने की परंपरा भी बताई गई है। इस वर्ष भी बड़ी संख्या में लोग समारोह में शामिल हुए।
नोट: यह खबर उपलब्ध कार्यक्रम रिपोर्ट के आधार पर स्वतंत्र रूप से तैयार की गई है। समारोह से जुड़े सांस्कृतिक और धार्मिक विवरण स्थानीय आयोजकों तथा प्रकाशित रिपोर्टों में बताए गए तथ्यों पर आधारित हैं।







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