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खजुराहो के जवारी मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा को मिलेगा मूल स्वरूप, एएसआई जोड़ेगा 11वीं सदी का मस्तक

· October 31, 2026 · 4 मिनट पढ़ें

Khajuraho Vishnu Idol: जवारी मंदिर की प्रतिमा को मिलेगा मूल स्वरूप

छतरपुर। मध्यप्रदेश के विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल खजुराहो से ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व की बड़ी खबर सामने आई है। यहां स्थित जवारी मंदिर में विराजमान भगवान विष्णु की करीब 11वीं सदी की खंडित प्रतिमा को अब उसका मूल स्वरूप लौटाने की तैयारी की जा रही है। लंबे समय से प्रतिमा का मस्तक गायब था, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को उसका मूल हिस्सा अपने ही स्टोर में मिल गया है।

करीब सात फीट ऊंची बलुआ पत्थर से निर्मित भगवान विष्णु की प्रतिमा का धड़, चारों भुजाएं और पैर सुरक्षित हैं। अब विशेषज्ञों की जांच के बाद मिले हुए मस्तक को प्रतिमा से जोड़ने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। इस पहल से खजुराहो की ऐतिहासिक धरोहर को उसका पुराना स्वरूप मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।

एएसआई के स्टोर में मिला प्रतिमा का लापता मस्तक

जवारी मंदिर की भगवान विष्णु की प्रतिमा का सिर लंबे समय से गायब था। इस मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अपने संरक्षित अवशेषों और स्टोर में रखे पुराने मूर्तिशिल्पों की जांच की। इसी दौरान एक ऐसा मस्तक मिला, जिसे प्रतिमा का मूल हिस्सा माना जा रहा है।

एएसआई के महानिदेशक यदुबीर सिंह रावत के अनुसार, स्टोर में मिले इस मस्तक की पहचान प्रतिमा से मिलान के आधार पर की गई है। पत्थर की संरचना, रंग, आकार और मुकुट की बनावट जैसे पहलुओं को पहचान का आधार बनाया गया है।

अब इस हिस्से को प्रतिमा से जोड़ने से पहले विशेषज्ञ इसकी तकनीकी जांच कर रहे हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संरक्षण के दौरान मूल मूर्ति या मिले हुए मस्तक को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे।

विशेषज्ञों की निगरानी में होगा संरक्षण कार्य

प्रतिमा का मस्तक जोड़ना सामान्य मरम्मत का काम नहीं है। यह एक प्राचीन और संरक्षित पुरातात्विक धरोहर है, इसलिए इसकी बहाली में वैज्ञानिक और तकनीकी मानकों का पालन किया जाएगा।

इसके लिए एएसआई ने विशेषज्ञों की समिति गठित की है। टीम प्रतिमा और मिले हुए मस्तक की स्थिति, पत्थर की गुणवत्ता, दोनों हिस्सों के आकार और उन्हें सुरक्षित तरीके से जोड़ने की तकनीक का अध्ययन करेगी।

विशेषज्ञों की जांच पूरी होने के बाद ही अंतिम प्रक्रिया तय होगी। एएसआई की ओर से नवंबर 2026 तक मस्तक को प्रतिमा से जोड़ने का लक्ष्य बताया गया है। हालांकि, वास्तविक समयसीमा संरक्षण कार्य की तकनीकी जांच और प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

चंदेलकालीन स्थापत्य कला की अनमोल धरोहर है जवारी मंदिर

खजुराहो का जवारी मंदिर अपनी स्थापत्य शैली और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह मंदिर चंदेलकालीन कला और वास्तुकला का महत्वपूर्ण उदाहरण है। खजुराहो के मंदिर समूह को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी शामिल किया गया है।

मंदिर में स्थापित भगवान विष्णु की प्रतिमा बलुआ पत्थर से निर्मित है। इसकी ऊंचाई लगभग सात फीट है। प्रतिमा में भगवान विष्णु के शरीर, आभूषणों और शिल्पकारी की बारीकियां तत्कालीन मूर्तिकला की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं।

प्रतिमा का मस्तक गायब होने के कारण इसका मूल स्वरूप अधूरा दिखाई देता था। अब मूल मस्तक मिलने और उसे वापस जोड़ने की तैयारी से इस ऐतिहासिक कलाकृति को पूर्ण रूप में देखने की संभावना बनी है।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था प्रतिमा की बहाली का मामला

जवारी मंदिर की इस खंडित प्रतिमा का मुद्दा सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। याचिकाकर्ता ने भगवान विष्णु की प्रतिमा को पुनर्स्थापित करने और उसका मूल स्वरूप लौटाने की मांग की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए स्पष्ट किया था कि संरक्षित पुरातात्विक स्मारक से जुड़े संरक्षण और बहाली के मामलों में निर्णय लेने का अधिकार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के दायरे में आता है।

अब एएसआई की ओर से प्रतिमा का मूल मस्तक खोजे जाने और उसे दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया आगे बढ़ने से इस लंबे समय से चर्चा में रहे मामले में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।

खजुराहो की विरासत संरक्षण की दिशा में अहम कदम

खजुराहो देश-विदेश के पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र है। यहां के मंदिर और मूर्तियां भारतीय इतिहास, धार्मिक परंपरा और प्राचीन शिल्पकला की पहचान हैं।

जवारी मंदिर की भगवान विष्णु प्रतिमा का मस्तक सुरक्षित तरीके से वापस जोड़ दिया जाता है, तो यह केवल एक मूर्ति की मरम्मत नहीं होगी, बल्कि प्राचीन विरासत के संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।

इस काम के पूरा होने के बाद पर्यटक और श्रद्धालु भगवान विष्णु की इस ऐतिहासिक प्रतिमा को उसके अधिक पूर्ण स्वरूप में देख सकेंगे। अब सभी की नजरें एएसआई की विशेषज्ञ टीम और नवंबर में प्रस्तावित संरक्षण कार्य पर टिकी हैं।

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