RSS के 100 साल: शाखाओं से सामाजिक सेवा तक बदला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वरूप, अब 88 संभागों में होगा काम

RSS के 100 साल: संघ में बड़े बदलाव, अब 88 संभागों में होगा संगठन का काम
इंदौर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपने 100 वर्षों के सफर में संगठनात्मक ढांचे से लेकर सामाजिक गतिविधियों तक कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। वर्ष 1925 में नागपुर से शुरू हुआ संघ आज देशभर में अपनी गतिविधियों का विस्तार कर चुका है। शुरुआती दौर में शाखाओं और संगठन के वैचारिक प्रसार पर केंद्रित रहने वाला संघ अब शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, सामाजिक समरसता और सेवा कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
संघ के शताब्दी वर्ष के समापन के बाद अब संगठन ने भविष्य की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। हाल ही में इंदौर में आयोजित अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में संगठन के विस्तार, शाखाओं की संख्या बढ़ाने और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर काम करने जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
1925 में नागपुर से हुई थी शुरुआत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। शुरुआती वर्षों में संघ का मुख्य उद्देश्य शाखाओं के माध्यम से स्वयंसेवकों को संगठित करना और अपने विचारों का प्रसार करना था।
समय के साथ संघ की गतिविधियों का दायरा बढ़ता गया। प्राकृतिक आपदाओं और संकट के समय स्वयंसेवकों ने राहत एवं सेवा कार्यों में भाग लिया। शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक गतिविधियों के जरिए भी संगठन ने अपनी पहुंच बढ़ाई।
गणवेश में भी हुए बड़े बदलाव
संघ की पहचान उसके पारंपरिक गणवेश से भी जुड़ी रही है। शुरुआती समय में स्वयंसेवक खाकी निकर, सफेद शर्ट, काली टोपी और चमड़े की बेल्ट पहनते थे।
वर्ष 2016 में गणवेश में बड़ा बदलाव किया गया। खाकी निकर की जगह भूरे रंग की फुल पैंट को शामिल किया गया। इसके साथ ही चमड़े की बेल्ट की अनिवार्यता भी समाप्त कर दी गई। यह बदलाव संघ की बाहरी कार्यशैली में आए प्रमुख परिवर्तनों में शामिल रहा।
46 प्रांतों की जगह अब 88 संभागों में संगठनात्मक काम
इंदौर में हुई अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में संघ की संगठनात्मक संरचना में बदलाव पर भी निर्णय लिया गया। अब तक संगठन देशभर में 46 प्रांतों के माध्यम से काम कर रहा था, लेकिन नई व्यवस्था के तहत इसे 88 संभागों में संचालित किया जाएगा।
इस बदलाव का उद्देश्य संगठनात्मक जिम्मेदारियों का नए सिरे से निर्धारण करना और अलग-अलग क्षेत्रों में गतिविधियों को बेहतर तरीके से संचालित करना है।
एक लाख से अधिक स्थानों तक पहुंचा संघ का काम
संघ की ओर से बैठक के बाद जारी जानकारी के अनुसार, देशभर में 63,208 स्थानों पर 99,423 दैनिक शाखाएं संचालित हो रही हैं। इसके अलावा 26,826 स्थानों पर साप्ताहिक मिलन और 13,363 स्थानों पर मासिक मंडलियां आयोजित की जा रही हैं।
कुल मिलाकर संघ का प्रत्यक्ष कार्य देशभर में 1,03,397 स्थानों तक पहुंच चुका है। संगठन के अनुसार, शताब्दी वर्ष के दौरान शाखाओं और सामाजिक गतिविधियों के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया।
सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर काम करने की योजना
संघ अब समाज के विभिन्न वर्गों तक अपनी पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। इसके तहत शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, परिवार जागरूकता और स्वदेशी जैसे विषयों पर गतिविधियां संचालित करने की योजना है।
संघ के राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर के अनुसार, संगठन समाज के अलग-अलग वर्गों को जोड़ने और सामाजिक संस्थाओं के साथ सहभागिता बढ़ाने पर जोर देगा।
आपदा राहत और सेवा कार्यों में भी भागीदारी
बीते वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं के दौरान स्वयंसेवकों ने राहत और बचाव से जुड़े कार्यों में भाग लिया है। संघ की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में भोजन, दवाइयां और जरूरी सामान पहुंचाने के लिए स्वयंसेवकों ने सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर काम किया।
इसके अलावा चिकित्सा सुविधाओं और शिक्षा से जुड़े कार्यों में भी संघ से प्रेरित संस्थाओं की भागीदारी रही है।
इंदौर बना शताब्दी वर्ष की समीक्षा का केंद्र
2 से 4 नवंबर 2026 तक इंदौर में आयोजित अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में देशभर से करीब 400 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बैठक में शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की समीक्षा के साथ भविष्य की योजनाओं पर चर्चा हुई।
संघ के 100 वर्षों का यह सफर संगठन के विस्तार, गणवेश में बदलाव, सामाजिक गतिविधियों और संगठनात्मक संरचना में हुए परिवर्तनों को दर्शाता है। अब 88 संभागों की नई व्यवस्था के साथ संघ अपने आगामी कार्यों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है।




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