ओंकारेश्वर में पितृ मोक्ष अमावस्या पर उमड़ा आस्था का सैलाब, 50 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने किया नर्मदा स्नान

ओंकारेश्वर में पितृ मोक्ष अमावस्या पर 50 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने किया नर्मदा स्नान

ओंकारेश्वर, मध्यप्रदेश। पितृ मोक्ष अमावस्या के अवसर पर मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध तीर्थस्थल ओंकारेश्वर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। अपने पूर्वजों की आत्मिक शांति और मोक्ष की कामना लेकर बड़ी संख्या में लोग मां नर्मदा के घाटों पर पहुंचे। सुबह करीब चार बजे से ही श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया था। दिन चढ़ने के साथ घाटों पर भीड़ बढ़ती गई। अनुमान के मुताबिक, 50 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने मां नर्मदा में आस्था की डुबकी लगाई और पितरों के निमित्त तर्पण, पूजन तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए।

पितृ मोक्ष अमावस्या हिंदू धार्मिक परंपरा में विशेष महत्व रखती है। पितृ पक्ष के अंतिम दिन लोग अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करते हैं और उनकी शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण तथा दान-पुण्य जैसे धार्मिक कर्म करते हैं। ओंकारेश्वर में इस अवसर पर नर्मदा स्नान के साथ स्थानीय धार्मिक परंपराओं और निमाड़ की लोक संस्कृति की झलक भी देखने को मिली।

सुबह चार बजे से घाटों पर पहुंचने लगे श्रद्धालु

पितृ मोक्ष अमावस्या पर ओंकारेश्वर के विभिन्न नर्मदा घाटों पर सुबह से ही धार्मिक गतिविधियां शुरू हो गईं। श्रद्धालुओं ने स्नान के बाद अपने पूर्वजों के निमित्त तर्पण किया और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के साथ पूजन-अर्चन कराया।

कई परिवारों ने पुरोहितों के माध्यम से विधि-विधान से धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए। वहीं, अनेक श्रद्धालु सामूहिक रूप से पितृ कर्म करते नजर आए। घाटों पर मंत्रोच्चार और पूजा-पाठ के बीच भजन-कीर्तन की ध्वनि से वातावरण भक्तिमय बना रहा।

दूर-दराज के क्षेत्रों से पहुंचे लोगों के लिए यह अवसर अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं का निर्वहन करने का भी रहा। श्रद्धालुओं की आवाजाही देर रात तक जारी रहने की जानकारी सामने आई।

नागर और अभय घाट पर देर रात तक धार्मिक अनुष्ठान

ओंकारेश्वर के नागर घाट और अभय घाट पर देर रात तक धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला चलता रहा। श्रद्धालुओं ने यहां अपने पितरों की शांति और परिवार के कल्याण की कामना से पूजा-पाठ तथा तर्पण किया।

कुछ स्थानों पर स्थानीय परंपराओं से जुड़ी विशेष धार्मिक गतिविधियां भी देखने को मिलीं। श्रद्धालु अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार पूजा-अर्चना और अनुष्ठान में शामिल हुए। इन परंपराओं का स्वरूप अलग-अलग परिवारों और समुदायों में भिन्न हो सकता है।

अमावस्या के अवसर पर घाटों पर बनी धार्मिक गतिविधियों ने ओंकारेश्वर की तीर्थ परंपरा को एक बार फिर सामने रखा। यहां आने वाले लोगों के लिए मां नर्मदा में स्नान और पितृ कर्म इस पर्व के प्रमुख आकर्षण रहे।

बड़वा-भोपाओं के पास भी पहुंचे लोग

पितृ मोक्ष अमावस्या के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु स्थानीय धार्मिक परंपराओं से जुड़े बड़वा-भोपाओं के पास भी पहुंचे। लोग अपनी मान्यताओं के अनुसार परिवार में सुख-शांति और परेशानियों से मुक्ति की कामना लेकर इन धार्मिक क्रियाओं में शामिल हुए।

खरगोन जिले के लक्ष्मण महाराज ने बताया कि बड़वा-भोपाओं से जुड़ी परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है। उनके अनुसार, श्रद्धालु अपनी आस्था और पारिवारिक परंपराओं के आधार पर यहां पहुंचते हैं।

देवा महाराज ने भी इन गतिविधियों को स्थानीय मान्यताओं से जुड़ा बताया। उनके मुताबिक, कुछ लोग लंबे समय से चली आ रही पारिवारिक परेशानियों से मुक्ति की कामना के साथ इन अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। हालांकि, इन गतिविधियों से जुड़े दावों को धार्मिक मान्यताओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

धार्मिक आस्था के साथ दिखी निमाड़ की लोक संस्कृति

ओंकारेश्वर के घाटों पर पितृ मोक्ष अमावस्या के दौरान धार्मिक अनुष्ठानों के साथ निमाड़ की लोक संस्कृति भी जीवंत दिखाई दी। भजन-कीर्तन के अलावा निमाड़ी गम्मत ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इससे तीर्थस्थल पर धार्मिक परंपराओं और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत का संगम देखने को मिला।

निमाड़ी गम्मत क्षेत्र की लोकनाट्य परंपरा का हिस्सा है। ऐसे अवसरों पर लोकगीत, पारंपरिक प्रस्तुतियां और सामुदायिक गतिविधियां स्थानीय संस्कृति को लोगों के सामने लाती हैं। अमावस्या के दौरान घाटों पर धार्मिक कर्मकांड के बीच इस तरह की सांस्कृतिक झलक ने आयोजन को विशिष्ट स्वरूप दिया।

श्रद्धालुओं के लिए ओंकारेश्वर की यात्रा केवल नर्मदा स्नान तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें पितरों का स्मरण, पारिवारिक परंपराओं का निर्वहन और स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक वातावरण का अनुभव भी शामिल रहा।

पितृ मोक्ष अमावस्या का धार्मिक महत्व

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, पितृ मोक्ष अमावस्या पर पूर्वजों का स्मरण कर उनके निमित्त श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान जिन लोगों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाता, वे भी इस दिन अपने पूर्वजों के लिए धार्मिक कर्म करते हैं।

श्राद्ध और तर्पण की विधियां परिवार, परंपरा और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। ओंकारेश्वर जैसे तीर्थस्थलों पर मां नर्मदा के तट पर इन कर्मों को संपन्न करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

ओंकारेश्वर का धार्मिक महत्व भगवान ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग और मां नर्मदा से जुड़ी आस्था के कारण भी विशेष है। पितृ पक्ष के अंतिम दिन यहां श्रद्धालुओं की मौजूदगी तीर्थस्थल की धार्मिक पहचान और क्षेत्र में प्रचलित परंपराओं को दर्शाती है।

आस्था, परंपरा और लोकजीवन का संगम बना ओंकारेश्वर

पितृ मोक्ष अमावस्या पर 50 हजार से अधिक श्रद्धालुओं के नर्मदा स्नान करने के अनुमान के साथ ओंकारेश्वर में दिनभर धार्मिक गतिविधियां जारी रहीं। घाटों पर तर्पण, पूजन और भजन-कीर्तन के साथ स्थानीय लोक परंपराओं की झलक भी दिखाई दी।

इस अवसर ने एक बार फिर ओंकारेश्वर को श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण तीर्थस्थल के रूप में सामने रखा, जहां मां नर्मदा के प्रति आस्था, पूर्वजों के प्रति सम्मान और क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत एक साथ दिखाई देती है।

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