भोपाल में फर्जी पासपोर्ट रैकेट की जांच तेज, 70 संदिग्ध पासपोर्ट मिले; संख्या 200 तक पहुंचने की आशंका

भोपाल में फर्जी पासपोर्ट रैकेट का बड़ा खुलासा

भोपाल।
मध्यप्रदेश में फर्जी दस्तावेजों के जरिए पासपोर्ट बनवाने के मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, नए तथ्य सामने आ रहे हैं। STF की जांच में अब तक करीब 70 संदिग्ध पासपोर्ट सामने आने की जानकारी है। जांच एजेंसी को आशंका है कि जांच का दायरा बढ़ने पर यह संख्या 200 तक पहुंच सकती है।

बौद्ध मठों के पते का इस्तेमाल

जांच में सामने आया है कि भोपाल के गोविंदपुरा क्षेत्र स्थित एक बौद्ध मठ के पते से करीब 40 पासपोर्ट बनाए जाने की जानकारी मिली है। इसके अलावा डबरा में एक अन्य बौद्ध मठ के पते से 17 और बैतूल से 11 पासपोर्ट जांच के दायरे में बताए गए हैं। छिंदवाड़ा और पांढुर्णा से भी संदिग्ध पासपोर्ट सामने आने की जानकारी है।

STF ने चार आरोपियों को किया गिरफ्तार

मामले में STF अब तक चार आरोपियों की गिरफ्तारी कर चुकी है। जांच एजेंसी अलग-अलग राज्यों में संभावित कनेक्शन की पड़ताल कर रही है। असम के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली और पश्चिम बंगाल से जुड़े पहलुओं की भी जांच की जा रही है।

साइबर कैफे कनेक्शन भी सामने आया

जांच में भोपाल और डबरा के दो साइबर कैफे से कुल 57 पासपोर्ट आवेदन किए जाने की जानकारी सामने आई है। STF इन आवेदन के IP एड्रेस और साइबर कैफे संचालकों की भूमिका की जांच कर रही है। एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि इन कैफे की भूमिका केवल ऑनलाइन आवेदन तक थी या फर्जी दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया में भी कोई संबंध था।

वेरिफिकेशन प्रक्रिया भी जांच के घेरे में

STF यह भी जांच कर रही है कि संदिग्ध पासपोर्ट के लिए इस्तेमाल किए गए दस्तावेज और पते किस तरह तैयार हुए और पुलिस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई। सरकारी रिकॉर्ड, दस्तावेज तैयार करने वालों और सत्यापन से जुड़े लोगों की भूमिका की भी पड़ताल की जा रही है।

अब आगे क्या?

फिलहाल STF दस्तावेजों, पासपोर्ट आवेदनों और संबंधित लोगों के बीच कड़ियों को जोड़ने में जुटी है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि इस पूरे नेटवर्क में कितने लोग शामिल थे और संदिग्ध पासपोर्ट की वास्तविक संख्या कितनी है।

नोट: मामले में जांच जारी है, इसलिए आरोपों और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े तथ्यों को अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि जांच एजेंसी के सामने आए तथ्यों के रूप में देखा जाना चाहिए।

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