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Bandhavgarh News: करीब 100 साल बाद बांधवगढ़ में लौटा बारहसिंगा, 48 से बढ़कर 65 हुई संख्या; संरक्षण अभियान को मिली सफलता

· November 5, 2026 · 5 मिनट पढ़ें

Bandhavgarh News: 100 साल बाद लौटा बारहसिंगा, संख्या बढ़कर 65 हुई

उमरिया। मध्यप्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से वन्यजीव संरक्षण को लेकर अच्छी खबर सामने आई है। करीब एक सदी पहले इस जंगल से गायब हो चुके बारहसिंगा की आबादी एक बार फिर यहां बढ़ने लगी है। कान्हा टाइगर रिजर्व से लाए गए 48 बारहसिंगों से शुरू हुआ पुनर्स्थापन अभियान अब सकारात्मक नतीजे दे रहा है। मई 2026 तक बांधवगढ़ में इनकी संख्या बढ़कर 65 हो गई थी।

मध्यप्रदेश के राजकीय पशु बारहसिंगा की वापसी को वन विभाग की महत्वपूर्ण संरक्षण उपलब्धि माना जा रहा है। इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन, अनुकूल घास के मैदानों का चयन, नियमित निगरानी और सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए। अब विभाग के सामने इस आबादी को सुरक्षित रखते हुए जंगल में इनका स्थायी कुनबा विकसित करने की चुनौती है।

2023 और 2024 में कान्हा से लाए गए 48 बारहसिंगा

बांधवगढ़ में बारहसिंगों को दोबारा बसाने की योजना पर काम शुरू करने से पहले उनके अनुकूल आवास की वैज्ञानिक जांच कराई गई थी। मध्यप्रदेश राज्य वन अनुसंधान संस्थान, जबलपुर के तकनीकी सहयोग से मगधी क्षेत्र के घास के मैदानों, भोजन, पानी और प्राकृतिक वातावरण का अध्ययन किया गया।

इसके बाद 26 मार्च 2023 को कान्हा टाइगर रिजर्व से 37 बारहसिंगों को बांधवगढ़ स्थानांतरित किया गया। पुनर्स्थापन अभियान के दूसरे चरण में मार्च 2024 में 11 और बारहसिंगे यहां लाए गए। इस तरह कुल 48 बारहसिंगों के साथ बांधवगढ़ में नई आबादी बसाने की शुरुआत हुई।

दो साल में 48 से बढ़कर 65 पहुंची संख्या

नए वातावरण में बारहसिंगों को सुरक्षित ढंग से बसाना वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती थी। उनके स्वास्थ्य, खानपान, पानी की उपलब्धता और व्यवहार पर लगातार नजर रखी गई। प्रजनन गतिविधियों की निगरानी के साथ सुबह और शाम उनकी गणना भी की जाती रही।

इन प्रयासों का असर आबादी में बढ़ोतरी के रूप में दिखाई दिया। वर्ष 2025 में बारहसिंगों की संख्या 56 दर्ज की गई थी, जबकि मई 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर 65 हो गया।

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक डॉ. अनुपम सहाय के नेतृत्व में संरक्षण और आवास प्रबंधन के प्रयासों को इस सफलता में अहम माना जा रहा है। संख्या में बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि बारहसिंगा यहां के वातावरण में खुद को ढालने और प्रजनन करने में सफल हो रहे हैं।

कभी कान्हा में सिर्फ 66 रह गए थे बारहसिंगा

हार्ड ग्राउंड बारहसिंगा अपनी खास शारीरिक बनावट और नर के सिर पर विकसित होने वाले कई शाखाओं वाले सींगों के लिए पहचाना जाता है। यह घास के मैदानों और जलस्रोतों के आसपास रहना पसंद करता है।

एक समय इस प्रजाति के अस्तित्व पर गंभीर संकट मंडरा रहा था। वर्ष 1969 में कान्हा टाइगर रिजर्व में इनकी संख्या घटकर महज 66 रह गई थी। इसके बाद वन विभाग ने संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए इनकी आबादी को फिर से बढ़ाने के प्रयास किए।

कान्हा में संरक्षण के बाद अब दूसरे जंगलों में भी बारहसिंगों की आबादी स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। बांधवगढ़ में इनका पुनर्स्थापन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

हाथियों और अजगर से बचाने के लिए विशेष सुरक्षा

बांधवगढ़ के जंगलों में जंगली हाथियों की मौजूदगी को देखते हुए बारहसिंगों के बाड़े की सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। बाड़े के आसपास सौर ऊर्जा आधारित फेंसिंग लगाई गई है, ताकि हाथियों से सुरक्षा व्यवस्था को नुकसान पहुंचने का खतरा कम किया जा सके।

वहीं, नवजात बारहसिंगों को सांपों और अजगर जैसे खतरों से बचाने के लिए भी विशेष फेंसिंग की व्यवस्था की गई है। वन विभाग का प्रयास है कि न केवल वयस्क बारहसिंगों की सुरक्षा हो, बल्कि नए जन्म लेने वाले शावक भी सुरक्षित रह सकें।

मगधी के अलावा मिली और जोगीवाड़ा के मैदान भी चिह्नित

बारहसिंगों के लिए बांधवगढ़ के मगधी क्षेत्र में घास के मैदानों को अनुकूल पाया गया था। अब इनके संभावित विस्तार के लिए मिली और जोगीवाड़ा के घास के मैदानों को भी चिह्नित किया गया है।

इन क्षेत्रों में पर्याप्त भोजन, पानी और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया जा रहा है। आबादी बढ़ने के साथ इनके लिए अधिक अनुकूल क्षेत्र विकसित करना जरूरी होगा, ताकि एक ही स्थान पर अधिक संख्या में वन्यजीवों का दबाव न बढ़े।

बांधवगढ़ में बारहसिंगों का स्थायी कुनबा बसाना अगली चुनौती

करीब 100 साल बाद बांधवगढ़ में बारहसिंगों की वापसी केवल एक वन्यजीव प्रजाति के पुनर्स्थापन तक सीमित नहीं है। यह जंगल की जैव विविधता को मजबूत करने और मध्यप्रदेश के राजकीय पशु के संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल है।

कान्हा से लाए गए 48 बारहसिंगों की संख्या का बढ़कर 65 होना अभियान की शुरुआती सफलता को दर्शाता है। अब वन विभाग के सामने इनके प्राकृतिक आवास का विस्तार, शावकों की सुरक्षा और आबादी को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखने की जिम्मेदारी है। यदि संरक्षण के प्रयास इसी तरह जारी रहे तो बांधवगढ़ के जंगलों में बारहसिंगों का स्वतंत्र और स्थायी कुनबा विकसित होने की उम्मीद बढ़ेगी।

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