इंदौर भागीरथपुरा जांच रिपोर्ट: जनप्रतिनिधियों को नहीं ठहराया जिम्मेदार
इंदौर, 1 अक्टूबर 2026। इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से बीमारी फैलने और लोगों की मौतों के मामले में न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट सामने आने के बाद प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर चर्चा तेज हो गई है। रिपोर्ट में इस घटना को किसी एक व्यक्ति की गलती का परिणाम मानने के बजाय लंबे समय से चली आ रही तकनीकी खामियों, निगरानी में कमी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में देरी से जुड़ा बताया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, पेयजल आपूर्ति व्यवस्था में मौजूद कमियां समय रहते दूर नहीं की गईं। सीवर और पानी की पाइपलाइनों की स्थिति, मरम्मत और बदलाव से जुड़ी प्रक्रियाएं तथा शिकायतों पर कार्रवाई जैसे पहलुओं की जांच की गई। वहीं, जनप्रतिनिधियों और कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका का परीक्षण करते हुए आयोग ने उनके खिलाफ व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया।
इस रिपोर्ट के बाद एक अहम सवाल सामने आया है कि जब किसी शहर की बुनियादी जलापूर्ति व्यवस्था में लंबे समय तक खामियां बनी रहें, तो उनकी निगरानी और समय पर सुधार की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होनी चाहिए।
जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर क्या कहा गया?
जांच आयोग ने जनप्रतिनिधियों की भूमिका का भी परीक्षण किया। रिपोर्ट के मुताबिक, केवल किसी पद पर होने या किसी फाइल पर हस्ताक्षर में देरी होने से किसी व्यक्ति को घटना के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति के पास कौन-से अधिकार थे, फाइल वास्तव में किसके पास रही और क्या उसकी ओर से कोई प्रमाणित लापरवाही हुई।
रिपोर्ट में इंदौर के तत्कालीन महापौर पुष्यमित्र भार्गव के संबंध में कहा गया कि एक प्रस्ताव पर हस्ताक्षर होने में 66 दिन का अंतर अपने आप में व्यक्तिगत लापरवाही साबित नहीं करता। आयोग को ऐसा पर्याप्त प्रमाण नहीं मिला कि पूरी अवधि के दौरान फाइल महापौर के पास ही लंबित रही थी।
इसी तरह, तत्कालीन निगमायुक्त दिलीप कुमार यादव को भी दूषित पानी की घटना या संबंधित टेंडर में देरी के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया। रिपोर्ट में उनके अधिकारों और निर्णय प्रक्रिया से संबंधित तथ्यों को ध्यान में रखा गया।
इसका अर्थ यह है कि आयोग ने पद पर रहने मात्र को व्यक्तिगत दोष का आधार नहीं माना। हालांकि, इससे नगर निगम की संस्थागत जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। रिपोर्ट में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी नगर निगम की व्यवस्था से जुड़ी होने की बात कही गई है।
नगर निगम की व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
जांच रिपोर्ट में इंदौर नगर निगम की जलापूर्ति व्यवस्था को लेकर कई कमियां दर्ज की गई हैं। आयोग के अनुसार, भागीरथपुरा में पेयजल और सीवर नेटवर्क के बीच तकनीकी स्तर पर ऐसी स्थितियां थीं, जिनसे पानी दूषित होने का खतरा बना हुआ था।
पेयजल और सीवर की पाइपलाइनें कई जगह एक-दूसरे के नजदीक थीं और कुछ स्थानों पर उनके बीच निर्धारित दूरी के मानकों का पालन नहीं किया गया था। कुछ जगहों पर सीवर लाइन पानी की पाइपलाइन के ऊपर होने की बात भी जांच में सामने आई।
ऐसी स्थिति में यदि पाइपलाइन क्षतिग्रस्त हो जाए या उसमें रिसाव होने लगे, तो सीवर का पानी पेयजल नेटवर्क में प्रवेश कर सकता है। आयोग ने पाइपलाइनों की खराब स्थिति, पुराने ढांचे और रिसाव को दूषित पानी की घटना से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में दर्ज किया।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यह संकट अचानक पैदा हुई किसी एक तकनीकी खराबी तक सीमित नहीं था। इसके पीछे लंबे समय से मौजूद कमियां और उन्हें दूर करने में हुई देरी भी महत्वपूर्ण थीं।
पाइपलाइन बदलने में देरी भी जांच के दायरे में
भागीरथपुरा में जलापूर्ति से संबंधित पुराने ढांचे को बदलने और नई पाइपलाइन से जुड़े कामों की प्रक्रिया में हुई देरी की भी जांच की गई। रिपोर्ट में विभिन्न परियोजनाओं और टेंडर प्रक्रियाओं के दौरान फाइलों के लंबित रहने तथा निर्णय लेने में समय लगने का उल्लेख है।
एक प्रस्ताव से जुड़ी फाइल पर 15 अक्टूबर 2025 को चर्चा के निर्देश दिए गए थे, लेकिन संबंधित अधिकारियों के बीच चर्चा दिसंबर में हुई। इस प्रक्रिया में लगभग 72 दिन लगने का मामला रिपोर्ट में दर्ज किया गया।
आयोग ने इस देरी को लेकर संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच की और यह सवाल उठाया कि जरूरी तकनीकी कार्यवाही तथा निर्णय समय पर क्यों नहीं किए गए। रिपोर्ट में फाइलों के संचालन, निगरानी और जिम्मेदारी के निर्धारण से जुड़े पहलुओं पर भी ध्यान दिया गया है।
एक अन्य पाइपलाइन परियोजना को निर्धारित समय से काफी देर बाद पूरा किए जाने का उल्लेख भी रिपोर्ट में है। परियोजना में देरी, तकनीकी निगरानी और ठेकेदार की जिम्मेदारी जैसे मुद्दों को अलग-अलग स्तर पर देखा गया।
आयोग के अनुसार, यदि आवश्यक कार्य और पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया समय पर पूरी हो जाती, तो दूषित पानी की घटना को रोकने की संभावना हो सकती थी। हालांकि, अलग-अलग अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने के लिए उनके अधिकारों, कार्यों और संबंधित दस्तावेजों का परीक्षण भी आवश्यक माना गया।
शिकायतों और दूषित पानी की जानकारी पर कार्रवाई का सवाल
जांच में यह पहलू भी सामने आया कि क्षेत्र में पाइपलाइनों की खराब स्थिति, रिसाव और बदबूदार या काले पानी की शिकायतों से जुड़े संकेत पहले भी मौजूद थे।
रिपोर्ट में संबंधित इंजीनियरिंग अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। एक अधिकारी के संबंध में उल्लेख किया गया कि उन्हें पाइपलाइन में खराबी और पानी की गुणवत्ता से जुड़ी शिकायतों की जानकारी थी, लेकिन उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों तक जानकारी पहुंचाने में आवश्यक तत्परता नहीं दिखाई।
आयोग ने निगरानी, समय पर शिकायतों की सूचना देने और निवारक रखरखाव में कमी को गंभीरता से लिया। सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए केवल शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है; संभावित खतरे की पहचान करना और समय रहते सुधार करना भी जरूरी है।
यह मामला शहरी जलापूर्ति व्यवस्था में विभागीय समन्वय की अहमियत को सामने लाता है। पेयजल और सीवर नेटवर्क से जुड़े विभागों के बीच जिम्मेदारियां स्पष्ट नहीं होने या सूचना का आदान-प्रदान प्रभावी नहीं होने पर ऐसी समस्याओं का समाधान देर से हो सकता है।
पुराने रिकॉर्ड नहीं मिलने से जांच में आई कठिनाई
आयोग को पुराने सीवर नेटवर्क और पेयजल परियोजनाओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध नहीं हो सके। इनमें मूल नक्शे, पाइपलाइन के संरेखण से जुड़े रिकॉर्ड और निर्माण की मंजूरी से संबंधित दस्तावेज शामिल थे।
सीवर नेटवर्क का निर्माण 1990 से 1995 के बीच और जलापूर्ति परियोजना का काम 1999 से 2004 के बीच किए जाने की जानकारी रिपोर्ट में दी गई है। इन परियोजनाओं से संबंधित मूल दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के कारण यह निर्धारित करने में कठिनाई हुई कि शुरुआत में किन तकनीकी निर्णयों के आधार पर नेटवर्क तैयार किया गया था।
कुछ रिकॉर्ड नष्ट किए जाने की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया, लेकिन सभी जरूरी दस्तावेजों के गायब होने का स्पष्ट और पुष्ट कारण सामने नहीं आया। आयोग ने रिकॉर्ड की अनुपलब्धता की अलग से जांच किए जाने की जरूरत बताई।
पुराने दस्तावेजों की कमी के कारण मूल निर्माण के समय हुई संभावित चूकों के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान करना भी कठिन हुआ। इससे यह स्पष्ट होता है कि सार्वजनिक परियोजनाओं में दस्तावेजों का सुरक्षित रखरखाव और समय-समय पर तकनीकी रिकॉर्ड की समीक्षा भी जवाबदेही का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
दूषित पानी की घटना में मौतों को लेकर क्या है रिपोर्ट?
भागीरथपुरा में दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 के दौरान दूषित पेयजल से बीमारी फैलने का मामला सामने आया था। इसके बाद क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों के बीमार पड़ने और मौतों की खबरें आई थीं।
न्यायिक जांच में चिकित्सा रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों का परीक्षण किया गया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, आयोग ने 22 मौतों को गैस्ट्रोएंटेराइटिस के प्रकोप से जोड़ा। अलग-अलग समाचार रिपोर्टों में कुल मौतों की संख्या के अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं, इसलिए इन संख्याओं को एक समान मानना उचित नहीं होगा।
जांच में पानी के नमूनों से संबंधित प्रयोगशाला परिणामों का भी उल्लेख किया गया। कुछ नमूनों में बैक्टीरिया की मौजूदगी और निर्धारित मानकों से अधिक प्रदूषण के संकेत मिले थे। इन तथ्यों ने पेयजल की गुणवत्ता और जलापूर्ति नेटवर्क की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए।
पीड़ित परिवारों के मुआवजे और आगे की कार्रवाई पर नजर
जांच रिपोर्ट में मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने की अनुशंसा का भी उल्लेख किया गया है। इसके साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जलापूर्ति व्यवस्था में सुधार, तकनीकी निगरानी मजबूत करने और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
रिपोर्ट में किसी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने या दोषमुक्त करने के निष्कर्ष संबंधित साक्ष्यों और जांच के दायरे पर आधारित हैं। जहां व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले, वहां आयोग ने केवल पद या हस्ताक्षर में देरी के आधार पर दोष निर्धारित नहीं किया।
भागीरथपुरा की घटना ने यह सवाल फिर सामने रखा है कि शहरों में सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करने के लिए बुनियादी ढांचे का नियमित रखरखाव, शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई और विभागीय जवाबदेही कितनी महत्वपूर्ण है।
अब आगे की प्रशासनिक कार्रवाई, रिपोर्ट की अनुशंसाओं पर अमल और जलापूर्ति व्यवस्था में किए जाने वाले सुधारों पर नजर रहेगी। प्रभावित परिवारों के लिए न्याय और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिहाज से यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच में सामने आई कमियों को दूर करने के लिए कौन-से ठोस कदम उठाए जाते हैं।












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