जबलपुर: पूर्व जिला न्यायाधीश ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति को हाईकोर्ट में दी चुनौती
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद से अनिवार्य सेवानिवृत्त किए गए पूर्व न्यायिक अधिकारी आर.के. श्रीवास की याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता ने अपनी सेवानिवृत्ति की प्रक्रिया और उस समय लागू सेवा नियमों पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि नियमों में बदलाव कर उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने का आधार तैयार किया गया था।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की युगलपीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता हेमंत श्रीवास्तव को न्याय मित्र नियुक्त किया है। न्याय मित्र मामले से जुड़े कानूनी पहलुओं पर अदालत की सहायता करेंगे। अब प्रकरण की अगली सुनवाई 16 नवंबर को निर्धारित की गई है।
वर्ष 2018 में दी गई थी अनिवार्य सेवानिवृत्ति
याचिका के अनुसार, आर.के. श्रीवास ने वर्ष 2000 में न्यायिक सेवा में प्रवेश किया था। उनके सेवा रिकॉर्ड में वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) के तहत अलग-अलग वर्षों में बी और सी ग्रेड दर्ज होने की बात कही गई है।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, उनके सेवा रिकॉर्ड के आधार पर वर्ष 2016 में उन्हें उच्च न्यायिक सेवा में पदोन्नति देकर जिला न्यायाधीश के प्रारंभिक स्तर पर नियुक्त किया गया था। हालांकि, उच्च न्यायिक सेवा में आने के बाद लगभग डेढ़ वर्ष की अवधि के दौरान उनका चार बार स्थानांतरण किया गया।
याचिका में यह भी बताया गया है कि इस दौरान उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई और उन्हें निलंबित भी किया गया। इसके बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की फुल बेंच की सिफारिश पर अप्रैल 2018 में उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई।
सेवा नियमों को लेकर क्या है याचिकाकर्ता की दलील?
आर.के. श्रीवास ने अपनी याचिका में मध्य प्रदेश उच्च न्यायिक सेवा (भर्ती और सेवा की शर्तें) नियम, 2017 के नियम 14 के उपनियम 2 का हवाला दिया है। उनका तर्क है कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए निर्धारित पात्रता और सेवा अवधि से जुड़े प्रावधानों पर सही तरीके से विचार नहीं किया गया।
याचिका में दावा किया गया है कि संबंधित प्रावधान के तहत अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए 10 वर्ष की सेवा पूरी होना या 50 वर्ष की आयु होना आवश्यक था। याचिकाकर्ता का कहना है कि सिविल जज और मजिस्ट्रेट के रूप में निचली न्यायपालिका में बिताई गई सेवा अवधि को उच्च न्यायिक सेवा की अवधि के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए था।
उनकी दलील है कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का निर्णय लेते समय लागू नियमों और उनकी वास्तविक पात्रता का समुचित परीक्षण किया जाना जरूरी था। इसी आधार पर उन्होंने सेवानिवृत्ति के आदेश को चुनौती दी है।
सेवानिवृत्ति से पहले नियमों में बदलाव का आरोप
याचिका का एक प्रमुख बिंदु अनिवार्य सेवानिवृत्ति से ठीक पहले सेवा नियमों में किए गए संशोधन से जुड़ा है। याचिकाकर्ता के अनुसार, मार्च 2018 में प्रभावी हुए संशोधनों के जरिए वर्ष 1994 के सेवा नियमों में बदलाव किया गया था।
याचिका में कहा गया है कि इन संशोधनों के तहत अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए आवश्यक सेवा अवधि 20 वर्ष से घटाकर 10 वर्ष कर दी गई, जबकि 50 वर्ष की आयु का प्रावधान बरकरार रखा गया।
आर.के. श्रीवास ने आरोप लगाया है कि नियमों में यह बदलाव उनकी अनिवार्य सेवानिवृत्ति का रास्ता तैयार करने के उद्देश्य से किया गया था। हालांकि, यह याचिकाकर्ता का आरोप है और इस संबंध में हाईकोर्ट का अंतिम निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है।
एसीआर ग्रेडिंग को भी बनाया आधार
याचिकाकर्ता ने अपनी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा है कि उनके पूरे सेवाकाल में बी और सी ग्रेड दर्ज किए गए थे। याचिका में इन ग्रेडिंग को अच्छा या बहुत अच्छा बताते हुए सेवानिवृत्ति के फैसले पर सवाल उठाए गए हैं।
उनका तर्क है कि सेवा रिकॉर्ड, पदोन्नति और लागू नियमों को समग्र रूप से देखते हुए ही अनिवार्य सेवानिवृत्ति का निर्णय लिया जाना चाहिए था। याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि संशोधित नियमों के आधार पर उनकी पात्रता किस तरह निर्धारित की गई।
न्याय मित्र की नियुक्ति, 16 नवंबर को अगली सुनवाई
मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ के समक्ष हुई। अदालत ने कानूनी पहलुओं पर सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता हेमंत श्रीवास्तव को न्याय मित्र नियुक्त किया है।
अब 16 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई में मामले के कानूनी पक्षों पर आगे विचार किया जाएगा। फिलहाल, पूर्व जिला न्यायाधीश की याचिका में सेवा नियमों के कथित उल्लंघन, नियमों में संशोधन और अनिवार्य सेवानिवृत्ति की प्रक्रिया को चुनौती दी गई है।
महत्वपूर्ण: अभी अदालत का अंतिम निर्णय आना बाकी है। इसलिए नियमों में बदलाव के उद्देश्य और सेवानिवृत्ति की वैधता से संबंधित आरोपों को याचिकाकर्ता की दलीलों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।












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