भोपाल में बेटियों के नाम दान की जमीन गिरवी रखकर लिया 2 करोड़ का लोन, बिल्डर दंपती पर EOW का केस

भोपाल में बेटियों की जमीन गिरवी रखकर 2 करोड़ का लोन लेने का आरोप, EOW का केस

भोपाल। राजधानी भोपाल में जमीन के स्वामित्व और बैंक ऋण से जुड़ा एक मामला सामने आया है। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने बिल्डर जीशान अली और उनकी पत्नी नाजनीन अली के खिलाफ कथित धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र के आरोप में मामला दर्ज किया है। आरोप है कि बावड़ियाकलां गांव में स्थित वह जमीन, जिसे पहले ही उनकी तीन बेटियों के नाम दान कर दिया गया था, उसे अपनी संपत्ति बताकर बैंक में गिरवी रखा गया और कंपनी के लिए दो करोड़ रुपये की ऋण सीमा प्राप्त की गई।

जांच एजेंसी के मुताबिक, पंजाब नेशनल बैंक का बकाया बढ़कर 2 करोड़ 7 लाख 86 हजार 807 रुपये से अधिक हो गया। ऋण की वसूली के दौरान जमीन के मालिकाना हक को लेकर बेटियों की ओर से अदालत में दीवानी मुकदमा भी दायर किया गया था। EOW ने संबंधित बैंकिंग और पंजीयन रिकॉर्ड की जांच के बाद 14 अक्टूबर 2026 को मामला दर्ज कर आगे की विवेचना शुरू की है। फिलहाल आरोपों की न्यायिक पुष्टि होना बाकी है।

2013 में बेटियों के नाम किया गया था जमीन का दान

EOW की जांच के अनुसार, भोपाल के बावड़ियाकलां गांव में 526.83 वर्गमीटर क्षेत्रफल की व्यावसायिक जमीन पहले जीशान अली के नाम पर थी। आरोप है कि उन्होंने 10 जुलाई 2013 को हिबानामे यानी दान के दस्तावेज के माध्यम से जमीन अपनी तीन बेटियों के नाम कर दी थी। इनमें से दो बेटियां उस समय नाबालिग थीं।

जांच एजेंसी के मुताबिक, जमीन के स्वामित्व में हुए इस बदलाव का उल्लेख बाद में बैंक को दी गई जानकारी में नहीं किया गया। जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि जीशान अली ने 20 फरवरी 2018 को बैंक के मुख्य प्रबंधक को लिखे पत्र में जमीन बेटियों के नाम करने की बात स्वीकार की थी।

यही दस्तावेज इस मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि जांच का एक प्रमुख बिंदु यह है कि जमीन के स्वामित्व में हुए बदलाव के बावजूद उसे बैंक के सामने किस आधार पर जीशान अली की संपत्ति के रूप में पेश किया गया।

2015 में कंपनी के लिए मंजूर हुई दो करोड़ की ऋण सीमा

जांच के मुताबिक, सितंबर 2015 में बैंक के समक्ष जमीन को जीशान अली की संपत्ति बताया गया। बैंक की कानूनी जांच रिपोर्ट में जमीन को विवाद और अन्य दावों से मुक्त बताया गया था। रिपोर्ट में नाबालिगों के हित से संबंधित जानकारी भी दर्ज नहीं थी।

इसके बाद 24 सितंबर 2015 को मेसर्स रॉयल हेरिटेज बिल्डर्स कोलोनाइजर्स इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड के लिए दो करोड़ रुपये की ओवरड्राफ्ट सीमा मंजूर की गई। जीशान अली इस कंपनी के प्रबंध निदेशक हैं।

इस ऋण के लिए जीशान अली, उनकी पत्नी नाजनीन अली और उनकी मां निकहत शमीम गारंटर बने थे। जांच एजेंसी का आरोप है कि बेटियों के नाम की गई जमीन को ही बैंक के पास गिरवी रखा गया। नवंबर 2015 में जमीन का बंधक विलेख भी पंजीकृत कराया गया।

EOW अब इस बात की जांच कर रही है कि जमीन के स्वामित्व से संबंधित जानकारी बैंक तक किस रूप में पहुंची और ऋण मंजूर करने की प्रक्रिया में किन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया।

नाबालिग की दूसरी संपत्ति बेचने के लिए ली थी अदालत से अनुमति

जांच में एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू भी सामने आया है। EOW के अनुसार, फरवरी 2015 में जीशान अली और नाजनीन अली ने अपनी नाबालिग बेटी के नाम दर्ज एक दूसरे प्लॉट को बेचने के लिए जिला न्यायालय से अनुमति प्राप्त की थी।

जांच एजेंसी ने इस तथ्य को इस सवाल के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना है कि क्या दंपती को नाबालिग के नाम की संपत्ति के संबंध में कानूनी प्रक्रिया और अदालत की अनुमति की आवश्यकता की जानकारी थी।

आरोप है कि इसके बावजूद बेटियों के नाम की जमीन को बैंक में गिरवी रखते समय हिबानामे की जानकारी नहीं दी गई और आवश्यक अनुमति भी नहीं ली गई। हालांकि, इस पहलू पर अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जा सकेगा।

बैंक का कर्ज एनपीए हुआ, वसूली के लिए जारी हुआ नोटिस

EOW की जांच के मुताबिक, वर्ष 2017 में कंपनी का ऋण खाता गैर-निष्पादित परिसंपत्ति यानी NPA हो गया। इसके बाद बैंक ने कर्ज की वसूली के लिए सिक्योरिटाइजेशन एंड रिकंस्ट्रक्शन ऑफ फाइनेंशियल एसेट्स एंड एनफोर्समेंट ऑफ सिक्योरिटी इंटरेस्ट (SARFAESI) कानून के तहत 3 जनवरी 2018 को मांग नोटिस जारी किया।

जांच के अनुसार, इससे पहले ही 4 अक्टूबर 2017 को बेटियों की ओर से अदालत में दीवानी मुकदमा दायर किया गया था। इस मुकदमे में जमीन पर अपना मालिकाना हक जताते हुए बैंक की वसूली कार्रवाई पर आपत्ति की गई थी।

मामले में जमीन के वास्तविक स्वामित्व, बैंक के बंधक अधिकार और वसूली प्रक्रिया को लेकर कानूनी विवाद सामने आया। बैंक ने अदालत में अपने जवाब में इस मुकदमे को जीशान अली की मिलीभगत से की गई कार्रवाई बताते हुए ‘प्रॉक्सी लिटिगेशन’ कहा था। यह बैंक का पक्ष था; इसे स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

दीवानी मुकदमे के बाद अपीलीय न्यायाधिकरण में भी पहुंचा मामला

रिपोर्ट के अनुसार, बेटियों की ओर से दायर दीवानी मुकदमा खारिज होने के बाद 10 सितंबर 2018 को ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण (DRAT), इलाहाबाद में अपील दायर की गई।

दूसरी ओर, ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT), जबलपुर ने 8 मार्च 2019 को बैंक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए वसूली प्रमाणपत्र जारी किया था। इसके बावजूद बैंक को पूरी बकाया राशि वापस नहीं मिली।

EOW के मुताबिक, बैंक का बकाया 2,07,86,807.48 रुपये से अधिक है। जांच एजेंसी ने बैंक, उप-पंजीयक कार्यालय भोपाल, DRT जबलपुर और DRAT इलाहाबाद के रिकॉर्ड की जांच के बाद एफआईआर दर्ज की।

इस पूरे घटनाक्रम में जमीन के दान, बैंक में बंधक रखने, ऋण की वसूली और स्वामित्व को लेकर हुए मुकदमे की अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं शामिल हैं। EOW की जांच का उद्देश्य कथित धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश से जुड़े पहलुओं की पड़ताल करना है।

जीशान अली और नाजनीन अली के खिलाफ FIR दर्ज

EOW ने 14 अक्टूबर 2026 को अपराध क्रमांक 106/2026 दर्ज किया। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, मामला भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4), जो धोखाधड़ी से संबंधित है, और धारा 61(2), जो आपराधिक षड्यंत्र से संबंधित है, के तहत दर्ज किया गया है।

जीशान अली की मां निकहत शमीम भी ऋण की गारंटर थीं, लेकिन उनकी मृत्यु हो चुकी है। इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई है।

फिलहाल जांच एजेंसी की ओर से दर्ज मामला आरोपों पर आधारित है। एफआईआर दर्ज होने का अर्थ यह नहीं है कि आरोपियों के खिलाफ आरोप अदालत में सिद्ध हो चुके हैं। मामले में दस्तावेजों, बैंक रिकॉर्ड और जमीन के स्वामित्व से जुड़े तथ्यों की जांच जारी है।

जमीन और बैंक ऋण से जुड़े दस्तावेज जांच के केंद्र में

इस मामले में आगे की जांच के दौरान कई सवाल महत्वपूर्ण रहेंगे—जमीन के दान के दस्तावेज बैंक की कानूनी जांच के समय सामने थे या नहीं, ऋण के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों में स्वामित्व किस तरह दर्शाया गया और बैंक के बकाया की वसूली के लिए अब तक क्या कार्रवाई हुई है।

साथ ही, जमीन के स्वामित्व को लेकर बेटियों की ओर से दायर मुकदमे और उसके बाद की अपीलीय प्रक्रिया के रिकॉर्ड भी मामले की कानूनी पृष्ठभूमि का हिस्सा हैं।

भोपाल का यह मामला जमीन के स्वामित्व, नाबालिगों के संपत्ति अधिकार और बैंक ऋण की सुरक्षा से जुड़े सवाल उठाता है। हालांकि, पूरे मामले की वास्तविक स्थिति EOW की जांच और आगे होने वाली न्यायिक कार्यवाही से ही स्पष्ट होगी।

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