उज्जैन में रावण दहन पर विवाद, 4 दशहरा समितियों को कानूनी नोटिस
उज्जैन। दशहरा पर्व से पहले उज्जैन में रावण दहन की परंपरा को लेकर विवाद गहरा गया है। अखिल भारतीय युवा ब्राह्मण समाज की ओर से शहर की चार प्रमुख दशहरा उत्सव समितियों को कानूनी नोटिस भेजे गए हैं। नोटिस में सवाल उठाया गया है कि दशहरे पर रावण दहन करने का धार्मिक और शास्त्रीय आधार क्या है। समितियों को सात दिन के भीतर जवाब देने के लिए कहा गया है। जवाब नहीं मिलने पर अदालत में मामला दायर करने की चेतावनी दी गई है।
रावण दहन की परंपरा पर उठाए सवाल
अखिल भारतीय युवा ब्राह्मण समाज का तर्क है कि रावण वेदों का ज्ञाता और भगवान शिव का भक्त था। संगठन का कहना है कि दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, इसलिए रावण दहन की परंपरा के धार्मिक आधार को स्पष्ट किया जाना चाहिए।
संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेश पुजारी की ओर से अधिवक्ता अश्विन चौधरी ने ये नोटिस जारी किए हैं। नोटिस में श्रीरामचरितमानस सहित विभिन्न धार्मिक ग्रंथों का उल्लेख करते हुए रावण दहन की परंपरा और उससे जुड़े धार्मिक संदेश पर सवाल उठाए गए हैं।
रावण वध की तिथि को लेकर भी सवाल
नोटिस में पद्म पुराण, वाल्मीकि रामायण और स्कंद पुराण का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि रावण वध की तिथि को लेकर धार्मिक ग्रंथों के आधार पर अलग व्याख्या सामने आती है। इसी आधार पर पूछा गया है कि आश्विन शुक्ल दशमी यानी दशहरे के दिन रावण दहन किस शास्त्रीय मान्यता के अनुसार किया जाता है।
संगठन ने यह सवाल भी उठाया है कि जब दशहरा सत्य की असत्य पर विजय का प्रतीक माना जाता है, तो रावण के पुतले के दहन की परंपरा को धार्मिक ग्रंथों के आधार पर किस तरह समझा जाना चाहिए। ये सवाल नोटिस में किए गए दावों का हिस्सा हैं; धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या और इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष अलग विषय हैं।
इन चार समितियों को भेजे गए नोटिस
रिपोर्ट के अनुसार, नोटिस पाने वाली समितियों में शामिल हैं:
- लाला ओम अमरनाथ खत्री दशहरा उत्सव समिति
- कार्तिक मेला दशहरा उत्सव समिति
- सिद्धवट दशहरा उत्सव समिति
- शास्त्रीनगर दशहरा उत्सव समिति
नोटिस में समितियों से रावण दहन के आयोजन का शास्त्रीय आधार स्पष्ट करने को कहा गया है। निर्धारित अवधि में जवाब नहीं मिलने पर संगठन की ओर से कानूनी कार्रवाई की बात कही गई है।
अब समितियों के जवाब पर नजर
दशहरा पर्व पर रावण दहन देश के अनेक हिस्सों में प्रचलित परंपरा है। उज्जैन में इस बार इस परंपरा को लेकर उठे सवालों ने धार्मिक और कानूनी चर्चा को जन्म दिया है। अब संबंधित समितियों के जवाब और संगठन की ओर से आगे उठाए जाने वाले कदमों पर नजर रहेगी। फिलहाल, अदालत में मामला दायर होने या किसी न्यायिक निर्णय की पुष्टि सामने नहीं आई है।













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