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MP High Court: लिपिकों के ADPO बनने का रास्ता बंद, हाईकोर्ट ने 10% पदोन्नति कोटा किया असंवैधानिक घोषित

· October 31, 2026 · 5 मिनट पढ़ें

MP High Court: ADPO का 10% प्रमोशन कोटा रद्द, क्लर्कों को झटका

ग्वालियर। मध्यप्रदेश के अभियोजन विभाग में कार्यरत लिपिकीय कर्मचारियों को सीधे सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी (ADPO) बनाने की व्यवस्था पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने इस पद के लिए निर्धारित 10 प्रतिशत पदोन्नति कोटे को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया है। अब इस कोटे के तहत लिपिकीय संवर्ग के कर्मचारियों को ADPO के पद पर नई पदोन्नति नहीं दी जा सकेगी।

न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि लिपिकीय कर्मचारियों को सीधे राजपत्रित अधिकारी के पद पर पदोन्नत करने के लिए बनाया गया विशेष प्रावधान संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। इस फैसले के बाद ADPO पदों पर भर्ती के लिए मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की सीधी भर्ती व्यवस्था लागू रहेगी।

2002 में बनाया गया था 10 प्रतिशत पदोन्नति का प्रावधान

इस विवाद की शुरुआत वर्ष 2002 में हुई थी। राज्य सरकार ने 14 अक्टूबर 2002 को मध्यप्रदेश लोक अभियोजन (राजपत्रित सेवा) भर्ती नियम, 1991 में संशोधन किया था। इसके तहत ADPO के कुल पदों में से 10 प्रतिशत पद लिपिकीय संवर्ग के पात्र कर्मचारियों की पदोन्नति के लिए निर्धारित कर दिए गए थे।

इस व्यवस्था के अनुसार, अभियोजन विभाग के कुछ लिपिकीय कर्मचारी, जिनके पास विधि की स्नातक डिग्री यानी LLB थी और जिन्होंने विभाग में कम से कम सात वर्ष की सेवा पूरी की थी, पदोन्नति के माध्यम से ADPO बन सकते थे। बाकी पद मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से सीधी भर्ती से भरे जाने थे।

इस प्रावधान को लेकर सवाल उठाए गए कि एक ही लिपिकीय संवर्ग के कर्मचारियों के लिए अलग-अलग पदोन्नति के रास्ते क्यों बनाए गए और क्या केवल LLB की डिग्री के आधार पर उन्हें सीधे द्वितीय श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी के पद पर पहुंचाया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन माना

याचिकाकर्ताओं ने 2002 के नियम संशोधन को चुनौती देते हुए तर्क दिया था कि लिपिकीय कर्मचारियों को ADPO के पद पर सीधे पदोन्नति देने की व्यवस्था समानता के अधिकार के खिलाफ है।

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि लिपिकीय संवर्ग के कर्मचारियों के लिए पहले से ही पदोन्नति की एक निर्धारित व्यवस्था मौजूद है। वर्ष 1998 के सेवा नियमों के तहत सहायक ग्रेड-3 के कर्मचारी सहायक ग्रेड-2, फिर सहायक ग्रेड-1 और इसके बाद अधीक्षक के पद तक पदोन्नत हो सकते हैं।

अदालत के अनुसार, एक ही मूल संवर्ग के कर्मचारियों के लिए एक तरफ तृतीय श्रेणी के पदों पर आगे बढ़ने का रास्ता हो और दूसरी तरफ कुछ कर्मचारियों को सीधे द्वितीय श्रेणी के राजपत्रित पद पर पहुंचाने का अलग रास्ता बना दिया जाए, तो इसके लिए उचित और तार्किक आधार होना जरूरी है।

पीठ ने माना कि इस विशेष कोटे के पीछे ऐसा कोई पर्याप्त आधार प्रस्तुत नहीं किया गया, जो इस वर्गीकरण को उचित ठहरा सके। इसी आधार पर अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार के विरुद्ध माना।

केवल LLB की डिग्री से अभियोजन अधिकारी की जिम्मेदारी नहीं

हाईकोर्ट ने ADPO के काम और लिपिकीय कर्मचारियों की जिम्मेदारियों के बीच अंतर को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि लिपिकीय कर्मचारियों का मुख्य काम कार्यालयीन दस्तावेज, फाइलें और प्रशासनिक रिकॉर्ड संभालना होता है, जबकि ADPO को अदालत में राज्य सरकार की ओर से आपराधिक मामलों की पैरवी करनी होती है।

इस पद पर नियुक्त अधिकारी को मुकदमों की सुनवाई के दौरान साक्षियों से सवाल-जवाब, साक्ष्य प्रस्तुत करने और कानूनी तर्क रखने जैसे महत्वपूर्ण कार्य करने पड़ते हैं।

पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि सिर्फ LLB की डिग्री प्राप्त कर लेने से कोई व्यक्ति अधिवक्ता नहीं बन जाता। अदालत ने अखिल भारतीय बार परीक्षा और व्यावहारिक कानूनी अनुभव के महत्व पर भी विचार किया। उसके अनुसार, न्यायालय में अभियोजन की जिम्मेदारी निभाने के लिए आवश्यक पेशेवर योग्यता और अनुभव का महत्व है।

पहले से पदोन्नत कर्मचारियों को मिली राहत

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पहले से इस कोटे के तहत ADPO बन चुके कर्मचारियों को राहत भी दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाएं दायर होने से पहले इस व्यवस्था के तहत की गई पदोन्नतियों पर फैसले का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि संबंधित पदोन्नत कर्मचारी इन याचिकाओं में पक्षकार नहीं थे और उनकी व्यक्तिगत पदोन्नति के आदेशों को अलग से चुनौती नहीं दी गई थी।

हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब भविष्य में 10 प्रतिशत पदोन्नति कोटे के तहत कोई नई नियुक्ति या पदोन्नति नहीं की जा सकेगी।

अभियोजन विभाग ने भी कोटा खत्म करने की सिफारिश की थी

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि अभियोजन विभाग के संचालक ने 4 जुलाई 2019 को राज्य सरकार को पत्र लिखकर इस पदोन्नति कोटे को समाप्त करने की सिफारिश की थी।

विभाग की ओर से यह बात रखी गई थी कि लिपिकीय संवर्ग से पदोन्नत होकर ADPO बने कुछ कर्मचारी न्यायालयीन कार्य और मुकदमों की पैरवी में अपेक्षित प्रभावशीलता नहीं दिखा पा रहे थे। इसी आधार पर विभाग ने इस व्यवस्था पर पुनर्विचार करने की अनुशंसा की थी।

अधिवक्ता रोहन शर्मा सहित अन्य ने दी थी चुनौती

इस नियम संशोधन को अधिवक्ता रोहन शर्मा और अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी ने पक्ष रखा।

मामले में दो याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई हुई। अदालत ने दोनों याचिकाओं को स्वीकार करते हुए 2002 के संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर निरस्त कर दिया।

इस फैसले से अभियोजन विभाग में ADPO बनने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव होगा। अब लिपिकीय कर्मचारियों के लिए निर्धारित 10 प्रतिशत पदोन्नति का रास्ता बंद रहेगा और इन पदों पर भर्ती लोक सेवा आयोग की सीधी भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से की जाएगी।

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