केन-बेतवा परियोजना पर हाईकोर्ट सख्त, पन्ना टाइगर रिजर्व पर मांगी रिपोर्ट
जबलपुर। मध्यप्रदेश की केन-बेतवा लिंक परियोजना के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। परियोजना से पन्ना टाइगर रिजर्व, केन घड़ियाल अभयारण्य और आसपास रहने वाले समुदायों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर दायर जनहित याचिका पर अदालत ने संबंधित पक्षों से रिपोर्ट और स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। मामले में केंद्रीय सशक्त समिति यानी सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चल रही कार्यवाही का मुद्दा भी उठाया गया।
याचिका में दावा किया गया है कि परियोजना के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व का आधे से अधिक हिस्सा डूब क्षेत्र में आ सकता है और करीब 60 लाख पेड़ों की कटाई की आशंका है। याचिकाकर्ता ने वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास, उनके विचरण मार्गों और बुंदेलखंड के पर्यावरण पर संभावित प्रभावों को लेकर सवाल उठाए हैं। हालांकि, ये याचिका में किए गए दावे हैं। इन पर अदालत का अंतिम निर्णय आना बाकी है।
हाईकोर्ट में केन-बेतवा परियोजना के प्रभावों पर सुनवाई
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे और न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ के समक्ष यह मामला आया। जबलपुर के अधिवक्ता अरिहंत तिवारी की ओर से दायर जनहित याचिका में परियोजना के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का व्यापक आकलन कराने की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान केंद्रीय सशक्त समिति की रिपोर्ट, उसमें बताई गई कथित अनियमितताओं और इसी परियोजना से जुड़े सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले की स्थिति का मुद्दा सामने आया। अदालत ने संबंधित पक्षों से रिपोर्ट और अब तक की कार्रवाई के संबंध में जानकारी मांगी।
मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि केन-बेतवा लिंक परियोजना से जुड़े व्यापक मुद्दे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी विचाराधीन हैं। ऐसे में हाईकोर्ट के सामने यह प्रश्न रहा कि जिन विषयों पर शीर्ष अदालत पहले से विचार कर रही है, उन पर समानांतर सुनवाई की सीमा क्या होनी चाहिए। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने इस पहलू को ध्यान में रखते हुए मामले पर विचार किया और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा।
मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को निर्धारित बताई गई है। आगे की कार्यवाही में संबंधित रिपोर्ट और जवाबों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
याचिका में 60 लाख पेड़ों की कटाई की आशंका
जनहित याचिका में दावा किया गया है कि केन-बेतवा लिंक परियोजना के कारण बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र प्रभावित हो सकता है। याचिकाकर्ता ने करीब 60 लाख पेड़ों की कटाई की आशंका जताते हुए इसके पर्यावरणीय प्रभावों का स्वतंत्र आकलन कराने की मांग की है।
पेड़ों की कटाई का मुद्दा केवल वन क्षेत्र के आकार तक सीमित नहीं है। बड़े वन क्षेत्र में बदलाव होने से वन्यजीवों के आवास, जैव विविधता, मिट्टी और स्थानीय पारिस्थितिकी पर प्रभाव पड़ सकता है। इसी आधार पर याचिका में परियोजना के संभावित प्रभावों का वैज्ञानिक मूल्यांकन कराने पर जोर दिया गया है।
हालांकि, याचिका में बताई गई पेड़ों की संख्या को अंतिम रूप से प्रमाणित आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक प्रभाव का आकलन संबंधित पर्यावरणीय अध्ययन, सरकारी रिकॉर्ड और सक्षम संस्थाओं की रिपोर्ट के आधार पर ही किया जा सकता है।
पन्ना टाइगर रिजर्व और बाघों के प्राकृतिक आवास का सवाल
याचिका में पन्ना टाइगर रिजर्व के संभावित डूब क्षेत्र को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। दावा है कि परियोजना से रिजर्व का आधे से अधिक हिस्सा प्रभावित हो सकता है। इसके चलते बाघों सहित अन्य वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और उनके एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में आने-जाने के मार्गों पर असर पड़ने की आशंका व्यक्त की गई है।
वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से प्राकृतिक आवास और विचरण गलियारों का महत्व होता है। यदि किसी क्षेत्र में जलभराव या अन्य निर्माण गतिविधियों के कारण बदलाव होता है, तो वन्यजीवों के आवास और उनके व्यवहार पर प्रभाव का अध्ययन जरूरी हो सकता है।
याचिका में केन घड़ियाल अभयारण्य को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें परियोजना के कारण जलीय जीवों और नदी से जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का आकलन करने की जरूरत बताई गई है।
इन आशंकाओं की वास्तविक सीमा और प्रभाव का निर्धारण वैज्ञानिक अध्ययन तथा संबंधित एजेंसियों की रिपोर्ट से ही किया जा सकेगा। अदालत में उठाए गए सवाल अपने आप में यह साबित नहीं करते कि सभी बताए गए नुकसान निश्चित रूप से होंगे।
वर्ष 2017 की पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट पर सवाल
याचिका में वर्ष 2017 में तैयार पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि रिपोर्ट में कुछ तथ्यात्मक त्रुटियां हैं और परियोजना के प्रभावों को समझने के लिए स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है।
याचिका में जल विज्ञान से जुड़े स्वतंत्र अध्ययन की मांग भी की गई है। इसका उद्देश्य परियोजना के कारण नदी, जल प्रवाह, वन क्षेत्र और स्थानीय पर्यावरण पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का आकलन करना है।
पर्यावरण प्रभाव आकलन का उद्देश्य किसी परियोजना के संभावित नुकसान और लाभों की पहचान करना तथा आवश्यक सुरक्षा उपायों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराना होता है। यदि किसी अध्ययन की पद्धति या निष्कर्षों पर सवाल उठते हैं, तो संबंधित रिकॉर्ड और विशेषज्ञों की रिपोर्ट के आधार पर उनकी जांच की जा सकती है।
इस मामले में EIA रिपोर्ट को लेकर लगाए गए आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष सामने आना बाकी है। अदालत में उठाई गई आपत्तियों और संबंधित पक्षों के जवाबों से ही आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
आदिवासियों और किसानों के विरोध का मुद्दा भी उठा
याचिका में छतरपुर जिले में परियोजना का विरोध कर रहे आदिवासियों और किसानों से संबंधित घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर प्रशासनिक दबाव डाला गया। राशन-पानी की आपूर्ति और ग्रामीणों की आवाजाही प्रभावित होने के दावे भी किए गए हैं।
ये आरोप भी याचिका में उठाए गए मुद्दों का हिस्सा हैं। इनके संबंध में प्रशासन या अन्य संबंधित पक्षों का विस्तृत जवाब और अदालत का अंतिम निष्कर्ष सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।
परियोजनाओं से जुड़े सामाजिक प्रभावों का आकलन करते समय स्थानीय आबादी, आजीविका, आवागमन और पुनर्वास जैसे विषय महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए पर्यावरणीय प्रभावों के साथ सामाजिक पहलुओं पर भी तथ्यात्मक समीक्षा की मांग की गई है।
केन-बेतवा लिंक परियोजना का उद्देश्य क्या है?
केन-बेतवा लिंक परियोजना का उद्देश्य केन नदी के पानी को बेतवा नदी के बेसिन तक पहुंचाना है, ताकि बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता बढ़ाई जा सके। इस परियोजना को क्षेत्र की जल आवश्यकताओं और कृषि संबंधी चुनौतियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाता है।
परियोजना के समर्थकों के अनुसार, नदी जोड़ने की योजना से जल उपलब्धता और कृषि जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है। दूसरी ओर, याचिका में इसके संभावित पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
इस तरह मामले में विकास संबंधी उद्देश्यों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सवालों का आकलन महत्वपूर्ण है। परियोजना के लाभों, संभावित नुकसान और सुरक्षा उपायों को समझने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन, पारदर्शी जानकारी और कानूनी प्रक्रिया की भूमिका अहम रहती है।
13 अक्टूबर की सुनवाई पर रहेगी नजर
केन-बेतवा लिंक परियोजना से जुड़े मामले में अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होने की जानकारी दी गई है। संबंधित पक्षों की रिपोर्ट और जवाब आने के बाद अदालत के सामने परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों, केंद्रीय सशक्त समिति की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित कार्यवाही की स्थिति से जुड़े पहलुओं पर आगे विचार हो सकता है।
फिलहाल अदालत में याचिका के दावों पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। पन्ना टाइगर रिजर्व, केन घड़ियाल अभयारण्य, पेड़ों की कटाई और स्थानीय समुदायों से जुड़े सवालों पर आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण रहेगी।
इस मामले का परिणाम यह स्पष्ट करने में मदद कर सकता है कि परियोजना से संबंधित पर्यावरणीय और सामाजिक चिंताओं पर किस तरह विचार किया जाता है तथा संबंधित एजेंसियों की रिपोर्ट और कार्रवाई को लेकर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।













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