स्वामित्व योजना में देरी पर कलेक्टरों को 7 दिन का अल्टीमेटम
भोपाल। मध्यप्रदेश में राजस्व कार्यों में देरी और रिश्वतखोरी की शिकायतों को लेकर सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। स्वामित्व योजना के तहत संपत्ति संबंधी दस्तावेजों के पंजीयन का काम अपेक्षित गति से नहीं होने पर मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने कलेक्टरों को सात दिन का अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि तय समय में काम आगे नहीं बढ़ा तो संबंधित कलेक्टरों को भोपाल बुलाकर जवाब मांगा जाएगा।
दूसरी ओर, नामांतरण, भूमि बंटवारे और अन्य राजस्व कार्यों में रिश्वत मांगने के आरोपों से जुड़े मामलों में भी कार्रवाई आगे बढ़ाई गई है। सतना, जबलपुर, नर्मदापुरम, सीहोर और भोपाल के पांच पटवारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अभियोजन की मंजूरी जारी की गई है। इन मामलों में लोकायुक्त की कार्रवाई और जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
सरकार की इस सख्ती के बीच स्वामित्व योजना के क्रियान्वयन को लेकर प्रशासन और पटवारी संघ के बीच जिम्मेदारियों तथा दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के अधिकार का मुद्दा भी सामने आया है।
सात दिन में काम पूरा कराने के निर्देश
मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने गुरुवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कलेक्टरों के साथ बैठक की। बैठक में स्वामित्व योजना की प्रगति की समीक्षा करते हुए उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि अगले सात दिन में काम को आगे बढ़ाया जाए और उसका परिणाम जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
मुख्य सचिव ने अधिकारियों से यह भी कहा कि यदि वे अपने जिले में योजना का काम नहीं करा पा रहे हैं, तो उन्हें भोपाल बुलाया जाएगा। इस निर्देश को योजना के क्रियान्वयन में तेजी लाने और जिला प्रशासन की जवाबदेही तय करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
कलेक्टर जिले में राजस्व प्रशासन के प्रमुख होते हैं। ऐसे में योजना के तहत निर्धारित कार्यों को समय पर पूरा कराने की जिम्मेदारी भी जिला प्रशासन की होती है। सरकार का जोर है कि अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच समन्वय की कमी के कारण आम लोगों के संपत्ति संबंधी काम लंबित नहीं रहने चाहिए।
स्वामित्व योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में संपत्ति के अभिलेखों को व्यवस्थित करना और संबंधित लोगों को उनके अधिकारों से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध कराने में मदद करना है। इसलिए इसके क्रियान्वयन में देरी होने पर ग्रामीण नागरिकों को भी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
पांच जिलों के पटवारियों के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी
राजस्व विभाग में रिश्वतखोरी से जुड़े मामलों में सतना, जबलपुर, नर्मदापुरम, सीहोर और भोपाल के पांच पटवारियों के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी जारी की गई है। इन मामलों में नामांतरण, भूमि बंटवारे और अन्य राजस्व संबंधी कामों के बदले कथित तौर पर रिश्वत मांगने या लेने के आरोप शामिल हैं।
अभियोजन की मंजूरी का अर्थ है कि संबंधित मामले में कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे अभियोजन चलाने की अनुमति दी गई है। यह अपने आप में आरोपों पर अंतिम न्यायिक फैसला नहीं है। प्रत्येक मामले में आरोपों का निर्धारण और दोष सिद्ध होने का प्रश्न जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार तय होगा।
सतना: नामांतरण और बंटवारे के लिए रिश्वत मांगने का आरोप
सतना जिले के तत्कालीन पटवारी संतोष सतनामी पर भूमि के नामांतरण और बंटवारे से जुड़े काम के लिए 15 हजार रुपये मांगने का आरोप है। रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें पांच हजार रुपये लेते हुए पकड़े जाने का मामला सामने आया था। अब इस प्रकरण में अभियोजन की मंजूरी जारी की गई है।
जबलपुर: चार बीघा जमीन के नामांतरण का मामला
जबलपुर के पटवारी सनी द्विवेदी पर चार बीघा जमीन के नामांतरण के बदले 15 हजार रुपये मांगने का आरोप है। इस मामले में 13 हजार रुपये लेते हुए पकड़े जाने का उल्लेख किया गया है। प्रकरण में कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाने के लिए अभियोजन की मंजूरी दी गई है।
सीहोर: भूमि नामांतरण के बदले आठ हजार रुपये मांगने का आरोप
सीहोर के पटवारी धर्मेंद्र सिंह राठौर पर भूमि नामांतरण के काम के बदले आठ हजार रुपये मांगने का आरोप है। इस मामले में भी अभियोजन की मंजूरी जारी की गई है।
भोपाल: मकान के नामांतरण और लीज नवीनीकरण से जुड़ा मामला
भोपाल के कोलार क्षेत्र के पटवारी मंगलेश खंडेलवाल पर मकान के नामांतरण और लीज नवीनीकरण के एवज में आठ हजार रुपये रिश्वत लेने का आरोप है। इस मामले में भी अभियोजन की अनुमति दी गई है।
नर्मदापुरम के पटवारी के खिलाफ भी मंजूरी
नर्मदापुरम के पटवारी देवेंद्र सहारिया के खिलाफ भी अभियोजन की मंजूरी जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में इस प्रकरण के आरोपों और घटनाक्रम का विस्तृत ब्योरा नहीं दिया गया है।
इन मामलों में आगे की कानूनी प्रक्रिया संबंधित प्रकरणों के रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर चलेगी।
स्वामित्व योजना को लेकर पटवारी संघ की क्या मांग है?
स्वामित्व योजना के क्रियान्वयन को लेकर पटवारी संघ की ओर से भी अपनी स्थिति स्पष्ट की गई है। संघ का कहना है कि उसकी आपत्ति योजना के उद्देश्य से नहीं है। उसके मुताबिक, इस योजना से ग्रामीण लोगों को संपत्ति का रिकॉर्ड मिलने और बैंक से ऋण जैसी सुविधाओं तक पहुंच आसान होने में मदद मिल सकती है।
पटवारी संघ की मुख्य मांग यह है कि दस्तावेजों के निष्पादन और पंजीयन की प्रक्रिया में संबंधित अधिकारियों की वैधानिक भूमिका स्पष्ट की जाए। संघ चाहता है कि दस्तावेजों पर हस्ताक्षर और उनके निष्पादन का काम कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर, एसडीओ या एसडीएम अथवा शासन की ओर से विधिसम्मत रूप से अधिकृत सक्षम अधिकारी के माध्यम से कराया जाए।
संघ ने मैदानी स्तर पर पटवारियों की भूमिका और अभिलेख तैयार करने से जुड़ी जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने, लिखित मार्गदर्शन देने तथा कानूनी संरक्षण उपलब्ध कराने की मांग भी रखी है।
उसका तर्क है कि जिस कार्य के लिए किसी कर्मचारी की वैधानिक अधिकारिता स्पष्ट नहीं है, उसमें व्यक्तिगत कानूनी जवाबदेही लेकर हस्ताक्षर करना उचित नहीं होगा। इस मांग के चलते योजना के उद्देश्य के साथ-साथ दस्तावेजी प्रक्रिया और जिम्मेदारियों के निर्धारण का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो गया है।
राजस्व विभाग की भूमिका क्यों है अहम?
स्वामित्व योजना में राजस्व अभिलेखों की शुद्धता, संपत्ति से संबंधित विवरण और दस्तावेजों की वैधानिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन और संपत्ति से जुड़े रिकॉर्ड का उपयोग विभिन्न प्रशासनिक और वित्तीय कार्यों में किया जा सकता है। ऐसे में दस्तावेजों की प्रक्रिया स्पष्ट और व्यवस्थित होना जरूरी है।
योजना के क्रियान्वयन में राजस्व विभाग के साथ अन्य संबंधित विभागों और जिला प्रशासन के बीच समन्वय की आवश्यकता होती है। अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारियां स्पष्ट होने से काम में देरी कम करने तथा नागरिकों की शिकायतों का समाधान करने में मदद मिल सकती है।
सरकार की ओर से कलेक्टरों को दिया गया अल्टीमेटम इसी प्रशासनिक जवाबदेही के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। वहीं, पटवारी संघ की मांगों पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी होने से योजना के क्रियान्वयन से जुड़ी व्यावहारिक और कानूनी उलझनों को दूर करने में मदद मिल सकती है।
अब सात दिन की समयसीमा पर रहेगी नजर
मध्यप्रदेश में स्वामित्व योजना के काम को गति देने के लिए जिला प्रशासन पर दबाव बढ़ा है। मुख्य सचिव ने कलेक्टरों को सात दिन के भीतर प्रगति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। वहीं, पांच जिलों के पटवारियों के खिलाफ रिश्वत से जुड़े मामलों में अभियोजन की मंजूरी से राजस्व विभाग में जवाबदेही का मुद्दा भी चर्चा में है।
आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जिला प्रशासन निर्धारित समय में योजना का काम कितना आगे बढ़ा पाता है और पटवारी संघ की ओर से उठाए गए वैधानिक जिम्मेदारी संबंधी सवालों पर क्या निर्णय होता है। रिश्वतखोरी के मामलों में संबंधित आरोपियों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया भी अपने नियमानुसार आगे बढ़ेगी।
सरकार के सामने चुनौती यह है कि योजना के लाभ पात्र ग्रामीण नागरिकों तक पहुंचें, राजस्व संबंधी कार्यों में अनावश्यक देरी न हो और कर्मचारियों की जिम्मेदारियां स्पष्ट रहते हुए भ्रष्टाचार की शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई की जा सके।












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