सर्वपितृ अमावस्या पर उज्जैन में श्राद्ध करेंगी नाजिया इलाही खान
उज्जैन। धार्मिक आस्था और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा से जुड़े एक फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता नाजिया इलाही खान चर्चा में हैं। उन्होंने 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के अवसर पर मध्यप्रदेश के उज्जैन में अपने दिवंगत पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण करने का निर्णय लिया है। उनका कहना है कि वह लंबे समय से अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना चाहती थीं और अब सनातन परंपरा के अनुसार यह धार्मिक अनुष्ठान करेंगी।
नाजिया इलाही खान के इस निर्णय ने धार्मिक आस्था, पारिवारिक परंपराओं और व्यक्तिगत विश्वास को लेकर चर्चा शुरू कर दी है। उन्होंने अपने फैसले को पूर्वजों के प्रति सम्मान और श्रद्धा से जुड़ा बताया है।
सर्वपितृ अमावस्या पर करेंगी श्राद्ध और तर्पण
हिंदू परंपरा में सर्वपितृ अमावस्या को पितृपक्ष का महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस दिन उन पूर्वजों के लिए भी श्राद्ध और तर्पण किया जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि परिवार के सदस्यों को ज्ञात नहीं होती या जिनका निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया हो।
नाजिया इलाही खान ने इसी अवसर पर उज्जैन पहुंचकर अपने दिवंगत पूर्वजों के लिए धार्मिक विधि से श्राद्ध और तर्पण करने की बात कही है। उनके अनुसार, वह बीते कई वर्षों से अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की इच्छा रखती थीं।
उनका यह निर्णय ऐसे समय सामने आया है, जब पितृपक्ष के अंतिम दिनों में उज्जैन के धार्मिक स्थलों पर देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। यहां पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।
आस्था और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता को बताया आधार
नाजिया इलाही खान ने अपने फैसले को पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता से जोड़कर देखा है। उनका कहना है कि वह अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध और तर्पण करना चाहती हैं।
इस निर्णय को लेकर सार्वजनिक चर्चा में धार्मिक पहचान और व्यक्तिगत आस्था के प्रश्न भी सामने आए हैं। हालांकि, नाजिया के बयान का मुख्य आधार अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना है।
व्यक्तिगत धार्मिक आस्था और परंपराओं को लेकर लोगों के विचार अलग-अलग हो सकते हैं। ऐसे में इस फैसले को उनके व्यक्तिगत विश्वास और पूर्वजों के प्रति सम्मान के संदर्भ में देखना महत्वपूर्ण है।
पहले भी दो बार बाबा महाकाल के दर्शन कर चुकी हैं नाजिया
नाजिया इलाही खान इससे पहले भी उज्जैन आकर श्री महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना कर चुकी हैं। मार्च 2025 में रमजान के दौरान वह बाबा महाकाल के दर्शन करने पहुंची थीं। उस समय उन्होंने मंदिर में पूजा-अर्चना की और नंदी जी के दर्शन किए थे।
इसके बाद मार्च 2026 में भी उन्होंने उज्जैन पहुंचकर बाबा महाकाल के दर्शन किए। उनकी पिछली यात्राओं के दौरान भी धार्मिक आस्था और मंदिर दर्शन को लेकर उनके बयान चर्चा में रहे थे।
इस बार उनका उज्जैन आगमन एक अलग धार्मिक अनुष्ठान से जुड़ा है। वह सर्वपितृ अमावस्या पर अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण करने की तैयारी कर रही हैं।
तीन तलाक के खिलाफ कानूनी लड़ाई से मिली पहचान
नाजिया इलाही खान पश्चिम बंगाल की रहने वाली अधिवक्ता हैं। उन्हें तीन तलाक के मुद्दे पर चली कानूनी लड़ाई के दौरान व्यापक पहचान मिली। वह मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों, सामाजिक सुधार और समानता जैसे विषयों पर सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखती रही हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, वह वर्ष 2018 से भारतीय जनता पार्टी से भी जुड़ी रही हैं। विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर उनके बयानों के कारण वह समय-समय पर चर्चा में आती रही हैं।
हालांकि, इस बार उनकी चर्चा का केंद्र राजनीतिक बयानबाजी के बजाय सर्वपितृ अमावस्या पर अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण करने का उनका निर्णय है।
श्राद्ध और तर्पण के लिए प्रसिद्ध है उज्जैन
मध्यप्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध और तर्पण के लिए महत्वपूर्ण स्थानों में गिनी जाती है। यहां गया कोठा, रामघाट और सिद्धवट जैसे स्थलों पर श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध और तर्पण पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करने के माध्यम हैं। सर्वपितृ अमावस्या पर विशेष रूप से उन पितरों का स्मरण किया जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनके लिए निर्धारित तिथि पर अनुष्ठान नहीं हो सका।
इस अवसर पर उज्जैन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। नाजिया इलाही खान ने भी इसी परंपरा के तहत अपने पूर्वजों के लिए अनुष्ठान करने का निर्णय लिया है।
व्यक्तिगत आस्था के फैसले पर चर्चा
नाजिया इलाही खान के उज्जैन में श्राद्ध और तर्पण करने के निर्णय ने धार्मिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा को जन्म दिया है। उनके अनुसार, यह कदम अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की इच्छा से प्रेरित है।
10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के अवसर पर उनके प्रस्तावित अनुष्ठान पर लोगों की नजर रहेगी। यह मामला व्यक्तिगत आस्था, पारिवारिक स्मृतियों और पूर्वजों के प्रति सम्मान जैसे विषयों को सामने लाता है।












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