क्या है सावन माह का महत्व
सर्वप्रथम जानिए कि आखिर सावन माह का ही क्या महत्व है। पौराणिक कथाओं के अनुसार सावन माह में ही समुद्र मंथन किया गया था। मंथन के दौरान समुद्र से विष निकला, जिसे भगवान शंकर ने अपने कंठ में उतारकर संपूर्ण सृष्टि की रक्षा की थी। इसलिए माना जाता है कि इस माह में उनकी उपासना से विशेष कृपा प्राप्त होती है। सावन माह के विशेष दिनों में भगवान शिव का विविध रूपों में श्रृंगार होता है आैर इन दिनों में शिव भक्त उपवास रख कर शिव आराधना में लीन रहते हैं। साथ ही इसी माह में कावड़ यात्रा का दौर भी शुरू होता है। पूरे माह लोग शिव आराधना में लीन रहेंगे और पुण्य प्राप्त करेंगे, क्योंकि इसी माह भगवान विष्णु के योग निद्रा में लीन होने के बाद शिव जगत के कल्याण के लिए जाग्रत मुद्रा में आ जाते हैं। सावन मास को मासोत्तम मास कहा जाता है।
शुक्र ने कन्या राशि में प्रवेश कर लिया हैं। कन्या राशि में शुक्र एक महीने यानि 1 सितंबर 2018 तक रहेगा। आज से शुक्र के गोचर का सभी राशियों पर इसका ज्योतिषीय प्रभाव देखने को मिलेगा। वैसे ज्योतिष के अनुसार शुक्र को लाभप्रद ग्रह माना जाता है। शुक्र ग्रह कला, प्रेम, सैंदर्य, जीवनसाथी और भौतिक सुखों का कारक होता है। कुंडली में शुक्र के शुभ प्रभाव से व्यक्ति जीवन में घर, वाहन और समस्त सांसारिक सुखों को प्राप्त करता है। लेकिन यदि शुक्र के प्रभाव अशुभ हो तब जीवनसाथी से अनबन और भौतिक सुखों में कमी या परेशानियां आ सकती है। इसके अशुभ प्रभाव से जीवनसाथी से अनबन और भौतिक सुखों में कमी या परेशानियां आती हैं। आइए जानते हैं किस राशि पर इसका क्या प्रभाव पड़ने वाला है....
वैसे तो मंगला गौरी का व्रत मंगलवार को किया जाता है किंतु सावन माह के प्रत्येक मंगलवार को मंगला गौरी की पूजा का महत्व बहुत बढ़ जाता है। ये ठीक उसी प्रकार है जैसे सामान्य तौर पर हर सोमवार शिव पूजा के लिए अच्छा होता है किंतु सावन माह में किया जाने वाला सोमवार का व्रत अधिक महात्म्य वाला और फलदायी माना जाता है।
पौराणिक मान्यताआें के अनुसार सृष्ठि के आरंभ से ही त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु आैर महेश उसकी रक्षा करते आ रहे हैं। एेसे में जब सावन के प्रारंभ होने से ठीक पहले विष्णु जी देवशयनी एकादशी पर योग निद्रा में चले जाते हैं, आैर सृष्टि के पालन की सारी ज़िम्मेदारियों से मुक्त होकर पाताललोक में विश्राम करने के लिए चले जाते हैं। तब उनका सारा कार्यभार महादेव भोले शंकर संभाल लेते हैं। सावन का प्रारंभ होते ही भगवान शिव जाग्रत हो जाते हैं आैर माता पार्वती के साथ पृथ्वी लोक का सारा कार्यभार संभाल लेते हैं। इसलिए सावन का महीना शिव के लिए बेहद खास होता है। इसी लिए इस माह में उनकी पूजा का महत्व भी बढ़ जाता है।
27 जुलाई 2018 को सदी का सबसे लंबा अनोखा चंद्र ग्रहण होने वाला है. नासा के मुताबिक यह 21वीं सदी का सबसे लंबा चंद्र ग्रहण होगा.
अपने विभिन्न चरणों के दौरान इस चंद्र ग्रहण की कुल अवधि 3 घंटे 55 मिनटों की होगी.
यह 27 जुलाई को रात 11.54 बजे शुरू होकर 28 जुलाई की सुबह 3.49 बजे तक चलेगा.
मेष: चली आ रही समस्या का समाधान होगा। भौतिक सुखों में वृद्धि होगी। नई नौकरी, प्रमोशन, चल या अचल संपत्ति की दिशा में सफलता मिलेगी।
27 जुलाई को सदी का सबसे लंबा चंद्रग्रहण लगने जा रहा है। ज्योतिषियों के अनुसार सभी जातकों पर इसका असर राशि अनुसार अलग-अलग पड़ेगा। मान्यता है कि ग्रहण के बाद दान करने से सारे कष्ट दूर किए जा सकते हैं। ऐसे में जानते हैं इस ग्रहण के प्रकोप को कम करने के लिए क्या करना चाहिए दान...
शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक चलने वाले चातुर्मास को शत्रु नाश की अवधि भी कहते हैं इसमें श्रद्घालुआें को व्रत आैर पूजन से भगवान को प्रसन्न करने की सलाह दी जाती है। इस बार देवशयनी एकादशी या आषाढ़ी एकादशी यानि 23 जुलाई 2018 से हरिप्रबोधनी एवं देवउत्थान एकादशी तक यानि 19 नवम्बर 2018 तक चातुर्मास रहेगा। इस अवधि में प्रतिदिन सूर्योदय के समय स्नान आदि से निवृत होकर भगवान विष्णु की आराधना करनी चाहिए। पंडित दीपक पांडे के अनुसार इस व्रत में कुछ खाद्य पदार्थों को पूर्ण रूप से त्यागने का सिद्धांत है। जैसे सावन मास में साग-सब्जी, भाद्रपद मास में दही, अश्वनी मास में दूध और कार्तिक मास में दालें नहीं ग्रहण करनी चाहिए। चातुर्मास का व्रत करने वाले व्यक्ति को चारपाई पर सोना, मांस मदिरा का सेवन करना, शहर आदि का त्याग करना भी वर्जित होता है। इस अवधि में जमीन पर शयन करना चाहिए आैर पूर्णत शाकाहारी भोजन करना चाहिए। कहते हैं इस अवधि में गुड़, तेल, दूध, दही, बैंगन, आैर हरी सब्जी आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।
किस खाद्य पदार्थ के त्याग का क्या है अर्थ
कहते हैं कि भगवान परशुराम ने शिव के नियमित पूजन के लिए पुरा महादेव में मंदिर की स्थापना करके कांवड़ में गंगाजल से पूजन कर कांवड़ परंपरा की शुरुआत की थी। आज वही परंपरा कांवड़ यात्रा का आधार मानी जाती है, जो देशभर में प्रचलित है। वैसे कर्इ आैर कथायें भी कांवड़ यात्रा से जुड़ी हैं, जैसे एक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन से निकले विष का पान करने से शिव जी की देह जलने लगी तो उसे शांत करने के लिए देवताआें ने विभिन्न पवित्र नदियों आैर सरोवरों के जल से उन्हें स्नान कराया। तभी से सावन माह में कांवड़ में सुदूर स्थानों से पवित्र जल लाकर शिव का जलाभिषेक करने की परंपरा प्रारंभ हुर्इ। एक अन्य कथा में समुद्र मंथन के बाद शिव जी को ताप से शांति दिलाने के लिए रावण द्वारा कांवड़ में जल ला कर शिव जी को शांति प्रदान करने की बात कही गर्इ है, परंतु सबसे ज्यादा प्रचलित कथा परशुराम जी की ही है।
मेष: शिक्षा प्रतियोगिता के क्षेत्र में सफलता मिलेगी। संतान के दायित्व की पूर्ति होगी। रुका हुआ धन लाभ मिलेगा। पारिवारिक सुख मिलेगा।
वृष: भागदौड़ रहेगी। लंबी यात्रा का योग है। मैत्री संबंध मधुर होगे। विरोधी सक्रिय रहेगा। स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने की आवश्यकता है।