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नहीं भरा IT रिटर्न, चार लाख कंपनियों का रजिस्ट्रेशन हो सकता है खारिज

नई दिल्ली। शेल कंपनियों पर कार्रवाई के तहत 11 लाख सक्रिय भारतीय कंपनियों में से एक तिहाई से अधिक कंपनियां डी-रजिस्टर्ड हो सकती हैं क्योंकि उन्होंने तीन वित्तीय वर्षों के लिए अपना रिटर्न दाखिल नहीं किया है। पिछले महीने से अब तक ऐसी करीब चार लाख कंपनियों को नोटिस भेजा जा चुका है।

इन कंपनियों ने साल 2013-14 और 2014-15 में रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज में रिटर्न दाखिल नहीं किया है। इन कंपनियों ने 2015-16 के वित्तीय वर्ष के लिए भी अपनी रिटर्न दाखिल नहीं किया है। हालांकि, इस साल रिटर्न दाखिल करने की प्रक्रिया अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

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J&K: आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान प्रदर्शनकारियों का पथराव, सुरक्षाबलों की फायरिंग में एक की मौत

श्रीनगर जम्मू-कश्मीर के बडगाम जिले में मंगलवार को आतंकवादियों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ में एक शख्स के मारे जाने और 8 के घायल होने की खबर है। बडगाम के चदूरा इलाके में 2 आतंकियों के छिपे होने की सूचना के बाद सुरक्षाबलों ने इस इलाके में सुबह में सर्च ऑपरेशन शुरू किया था। सुरक्षाबलों को इस मुठभेड़ में दो तरफ से चुनौती का सामना करना पड़ा। एक तरफ आतंकवादी थे, तो दूसरी तरफ आतंकियों से सहानुभूति रखने वाले पत्थरबाज लोग। ये लोग मुठभेड़ के दौरान सुरक्षाबलों की कार्रवाई में बाधा डालने की कोशिश करते रहे।
 

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यूपी सरकार ने किया साफ, कार्रवाई केवल अवैध बूचड़खानों पर, लाइसेंस वालों को डरने की जरूरत नहीं

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ समेत कई दूसरे इलाकों में मीट मछली खाने वालों को आज दिक्कत का सामना करना पड़ेगा क्योंकि बूचड़खानों पर हो रही कार्रवाई के विरोध में मांस विक्रेताओं की हड़ताल में मटन और चिकन विक्रेताओं के बाद अब मछली कारोबारियों ने भी इस हड़ताल में शामिल होने का ऐलान किया है. प्रदेश में हड़ताल की वजह से मांस परोसने वाले होटल अब बंदी की कगार पर पहुंच गए हैं. 100 साल के इतिहास में लखनऊ का टुंडे कबाबी पहली बार बंद हुआ, हालांकि मांसाहार का होटल चलाने वाले कुछ लोगों ने अवैध बूचड़खाने बंद किए जाने का स्वागत किया है. उनका कहना है कि प्रदेश में अगर मांस की किल्लत हुई तो वह दिल्ली से मटन मंगवाएंगे

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सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005

सूचना का अधिकार अधिनियम (Right to Information Act) भारत के संसद द्वारा पारित एक कानून है, जो 12 अक्तूबर, 2005 को लागू हुआ। भारत में भ्रष्टाचार को रोकने और समाप्त करने के लिए इसे बहुत ही प्रभावी कदम बताया जाता है। इस नियम के द्वारा भारत के सभी नागरिकों को सरकारी रिकार्डों और प्रपत्रों में दर्ज सूचना को देखने और उसे प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया गया है। जम्मू एवं काश्मीर को छोड़कर भारत के सभी भागों में यह अधिनियम लागू है।

सूचना का अधिकार क्या है?
संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत सूचना का अधिकार मौलिक अधिकारों का एक भाग है. अनुच्छेद 19(1) के अनुसार प्रत्येक नागरिक को बोलने व अभिव्यक्ति का अधिकार है। 1976 में सर्वोच्च न्यायालय ने "राज नारायण विरुद्ध उत्तर प्रदेश सरकार" मामले में कहा है कि लोग कह और अभिव्यक्त नहीं कर सकते जब तक कि वो न जानें. इसी कारण सूचना का अधिकार अनुच्छेद 19 में छुपा है. इसी मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि भारत एक लोकतंत्र है। लोग मालिक हैं, इसलिए लोगों को यह जानने का अधिकार है कि सरकारें जो उनकी सेवा के लिए हैं, क्या कर रहीं हैं? व प्रत्येक नागरिक कर/ टैक्स देता है. यहाँ तक कि एक गली में भीख मांगने वाला भिखारी भी टैक्स देता है जब वो बाज़ार से साबुन खरीदता है.(बिक्री कर, उत्पाद शुल्क आदि के रूप में). नागरिकों के पास इस प्रकार यह जानने का अधिकार है कि उनका धन किस प्रकार खर्च हो रहा है। इन तीन सिद्धांतों को सर्वोच्च न्यायालय ने रखा कि सूचना का अधिकार हमारे मौलिक अधिकारों का एक हिस्सा हैं.

यदि आरटीआई एक मौलिक अधिकार है, तो हमें यह अधिकार देने के लिए एक कानून की आवश्यकता क्यों है?
ऐसा इसलिए है क्योंकि यदि आप किसी सरकारी विभाग में जाकर किसी अधिकारी से कहते हैं, "आरटीआई मेरा मौलिक अधिकार है, और मैं इस देश का मालिक हूँ. इसलिए मुझे आप कृपया अपनी फाइलें दिखायिए", वह ऐसा नहीं करेगा. व संभवत: वह आपको अपने कमरे से निकाल देगा. इसलिए हमें एक ऐसे तंत्र या प्रक्रिया की आवश्यकता है जिसके तहत हम अपने इस अधिकार का प्रयोग कर सकें. सूचना का अधिकार 2005, जो 13 अक्टूबर 2005 को लागू हुआ हमें वह तंत्र प्रदान करता है. इस प्रकार सूचना का अधिकार हमें कोई नया अधिकार नहीं देता. यह केवल उस प्रक्रिया का उल्लेख करता है कि हम कैसे सूचना मांगें, कहाँ से मांगे, कितना शुल्क दें आदि.

सूचना का अधिकार कब लागू हुआ?
केंद्रीय सूचना का अधिकार 12 अक्टूबर 2005 को लागू हुआ. हालांकि 9 राज्य सरकारें पहले ही राज्य कानून पारित कर चुकीं थीं। ये थीं जम्मू कश्मीर, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, असम और गोवा।

सूचना के अधिकार के अन्र्तगत कौन से अधिकार आते हैं?
सूचना का अधिकार 2005 प्रत्येक नागरिक को शक्ति प्रदान करता है कि वो
  •  सरकार से कुछ भी पूछे या कोई भी सूचना मांगे।
  •   किसी भी सरकारी निर्णय की प्रति ले।
  •  किसी भी सरकारी दस्तावेज का निरीक्षण करे।
  •  किसी भी सरकारी कार्य का निरीक्षण करे।
  •  किसी भी सरकारी कार्य के पदार्थों के नमूने ले।


केन्द्रीय कानून जम्मू कश्मीर राज्य के अतिरिक्त पूरे देश पर लागू होता है. सभी इकाइयां जो संविधान, या अन्य कानून या किसी सरकारी अधिसूचना के अधीन बनी हैं या सभी इकाइयां जिनमें गैर सरकारी संगठन शामिल हैं जो सरकार के हों, सरकार द्वारा नियंत्रित या वित्त- पोषित किये जाते हों।

क्या निजी इकाइयां सूचना के अधिकार के अन्र्तगत आती हैं?
सभी निजी इकाइयां, जोकि सरकार की हैं, सरकार द्वारा नियंत्रित या वित्त- पोषित की जाती हैं सीधे ही इसके अन्र्तगत आती हैं. अन्य अप्रत्यक्ष रूप से इसके अन्र्तगत आती हैं. अर्थात, यदि कोई सरकारी विभाग किसी निजी इकाई से किसी अन्य कानून के तहत सूचना ले सकता हो तो वह सूचना कोई नागरिक सूचना के अधिकार के अन्र्तगत उस सरकारी विभाग से ले सकता है।

क्या पीआईओ सूचना देने से मना कर सकता है?
एक पीआईओ सूचना देने से मना उन 11 विषयों के लिए कर सकता है जो सूचना का अधिकार अधिनियम के अनुच्छेद 8 में दिए गए हैं। इनमें विदेशी सरकारों से प्राप्त गोपनीय सूचना, देश की सुरक्षा, रणनीतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों की दृष्टि से हानिकारक सूचना, विधायिका के विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने वाली सूचनाएं आदि. सूचना का अधिकार अधिनियम की दूसरी अनुसूची में उन 18 अभिकरणों की सूची दी गयी है जिन पर ये लागू नहीं होता. हालांकि उन्हें भी वो सूचनाएं देनी होंगी, जो भ्रष्टाचार के आरोपों व मानवाधिकारों के उल्लंघन से सम्बंधित हों।

 अर्जी कहां जमा करें
कोई भी पीआईओ या एपीआईओ के पास कर सकते हैं। केंद्र सरकार के विभागों के मामलों में, 629 डाकघरों को एपीआईओ बनाया गया है। अर्थात् आप इन डाकघरों में से किसी एक में जाकर आरटीआई पटल पर अपनी अर्जी व फीस जमा करा सकते हैं। वे आपको एक रसीद व आभार जारी करेंगे और यह उस डाकघर का उत्तरदायित्व हैं कि वो उसे उचित पीआईओ के पास भेजें।

अर्जी स्वीकार न होने पर अर्थदण्ड का प्रावधान
आप इसे डाक द्वारा भेज सकते हैं. आप इसकी औपचारिक शिकायत सम्बंधित सूचना आयोग को भी अनुच्छेद 18 के तहत करें. सूचना आयुक्त को उस अधिकारी पर 25000रु. का दंड लगाने का अधिकार है, जिसने आपकी अर्जी स्वीकार करने से मना किया था.

 सूचना समय-सीमा
 यदि आपने अपनी अर्जी पीआईओ को दी है, आपको 30 दिनों के भीतर सूचना मिल जानी चाहिए. यदि आपने अपनी अर्जी सहायक पीआईओ को दी है तो सूचना 35 दिनों के भीतर दी जानी चाहिए. उन मामलों में जहां सूचना किसी एकल के जीवन और स्वतंत्रता को प्रभावित करती हो, सूचना 48 घंटों के भीतर उपलब्ध हो जानी चाहिए।

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