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सीएमएचओ के संरक्षण में अवैध तरीके से संचालित हो रहे नर्सिंग होम

डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा जिला अस्पताल 
निजी क्लीनिकों में आम जनता का हो रहा शोषण
शासन नहीं उठा रहा कड़े कदम
नितिन चौबे
दमोह (एमपी मिरर)। सूबे के वित्तमंत्री जयंत मलैया के गृह जिला दमोह में स्वास्थ्य विभाग का भ्रष्टाचार चरम पर है। वर्तमान में मुख्य स्वास्थ्य एवं चिकित्सा अधिकारी कार्यालय भ्रष्टाचार का गढ़ बना हुआ है। स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर लकदक करता जिला अस्पताल जहां एक ओर डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर जिले में लगातार एक के बाद एक नए नए नर्सिंग होम अस्तित्व में आ रहे हैं। जिला अस्पताल की कमियों का फायदा उठाकर नित नए खुल रहे नर्सिंग होम्स में मरीज के परिजनों का जमकर आर्थिक शोषण किया जाता है। जिले में वर्तमान में 14 नर्सिंग होम एवं क्लीनिक विभाग में पजीकृत हैं और अनेक नर्सिंग होम बिना अनुमति के ही संचालित हो रहे हैं।
 
बिना पंजीयन चल रहे नर्सिंग होम
मुख्य स्वास्थ्य एवं चिकित्सा अधिकारी की नाक के नीचे जिले में ऐसे नर्सिंग होम भी संचालित हैं, जो बिना रजिस्ट्रेशन के ही संचालित किए जा रहे हैं। सरकारी डॉक्टर मनीष पटैल द्वारा बालाकोट रोड पर बिना नर्सिंग होम पंजीयन करवाए ही नर्सिंग होम का संचालन किया जा रहा है। सूत्रों की माने तो अथर्व क्लिनिक के संचालक डॉ. मनीष पटैल द्वारा नर्सिंग होम के रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन किया गया है, लेकिन अभी नर्सिंग होम का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है। बिना रजिस्ट्रेशन के ही अवैध रूप से नर्सिंग होम का संचालन डॉ. मनीष पटैल द्वारा कई माह पहले ही प्रांरभ कर दिया गया था। नर्सिंग होम में एक्सरे जैसी सुविधाएं भी अवैध रूप से मरीजों को मंहगे दामों पर उपलब्ध कराई जा रही हैं। वहीं डॉ. गौरव नायक द्वारा भी क्लीनिक के रजिस्ट्रेशन पर अस्पताल का संचालन  किया जा रहा है। क्लीनिक के आड़ में बिना पंजीयन ही कई बिस्तरों के अस्पताल का संचालन किया जा रहा है।
 
घूरे पर फेंका जाता है जैविक कचरा
जिले में सचांलित नर्सिंग होम्स से निकलने वाले जैविक अपशिष्ठ को ठिकाने लगाने का इन नर्सिंग होम्स के पास कोई ठोस विकल्प नहीं है। यूं तो दिखाने के लिए सागर और सतना की किसी कम्पनी से नर्सिंग होम संचालकोें ने अनुबंध कर रखा है, लेकिन वास्तविकता में अस्पताल से निकलने वाला तमाम बायो कचरा शहर के घूरों पर ही फेंका जाता है। इतना ही अस्पतालों में मरीजों द्वारा उपयोग किए जाने वाले कपड़े जैसे चादर, तकीये के खोल और कम्बल बगैरह की धुलाई भी सार्वजनिक तालाबों पर कराई जाती है। जिससे जल स्त्रोत के प्रदूषित होने का खतरा बढ़ जाता है। इसी तरह नर्सिंग होम में अस्पताल से निकलने वाले कचरे के लिए नियमानुसार अलग अलग डस्टबिन का उपयोग नहीं किया जाता है। उपयोग की गई निडिल, पट्टी, प्लास्टर, खून, मवाद जैसे संक्रामक कचरे के लिए एक ही कचरादान का उपायोग किया जाता है। सूत्रों का कहना है कि अस्तपाल से निकलने वाले प्लास्टिक कचरे को सीधे ही कबाड़ियों को बेच दिया जाता है। निजी अस्पतालों के इस आचरण से शहर में संक्रमण फैलने की संभावना लगातार बनी रहती है।
 
होते हैं अवैध गर्भपात
जिले में मानव भ्रूण का शव मिलना आम बात है। लगातार सार्वजनिक जगहों से मानव भ्रूण शवों की मिलने की खबरें यह सिद्व करती हैं कि जिले में संचालित नर्सिंग होम्स में अवैध गर्भपात का खेल खेला जाता है। शहर में कई बार मानव भ्रूण के शवों को कुत्तों द्वारा नोचते देखा गया जिसे बाद में पुलिस ने जप्त किया। बस स्टैण्ड, स्टेशन रोड सहित लगभग शहर के अधिकांश उन हिस्सों में मानव भ्रुण के शव बरामद हुए हैं जहां नर्सिंग होम संचालित हैं। माना जाता है कि अवैध गर्भपात के बाद मृत मानव भ्रुण को ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी भी गर्भपात कराने वाली महिला या उसके परिजनों को सौंप दी जाती है जिसके परिणाम स्वारूप शहर में यहां वहां मानव भ्रूण के शव लगातार बरामद होते रहे हैं।
 
अयोग्य कर रहे एक्सरे और मरहम पट्टी
वैद्य एवं अवैध रूप से संचालित नर्सिंग होम में कम वेतन देकर अयोग्य व्यक्तियों से कार्य कराया जाता है। इंजक्शन लगाना हो, छोटी मोटी छीर फाड़ हो, मरहम पट्टी करना हो, प्लासटर बांधना हो ये सब काम इन नर्सिंग होमों में आयोग्य व्यक्तियों द्वारा किए जाते हैं। 10वीं 12वीं पास वार्ड व्याय और अटेंडर के भरोसे मरीज को छोड़ दिया जाता है। पैसा वसूलने के लिए एक्सरे, पैथोलॉजी जैसे कार्य योग्य व्यक्ति से कराने की बजाए आयोग्य व्यक्ति से कराए जाते हैं । जिससे कई बार मरीज की जान पर भी बन आती है जिसे तत्काल जिले से बाहर रिफर कर मामले को दबाने का प्रयास किया जाता है। शहर के नर्सिंग होम्स में गलत ईलाज के चलते कई जाने जा चुकी हैं। सूत्र बताते हैं कि किसी भी नर्सिंग होम ने एक्सरे की सुविधा का पंजीयन नहीं कराया है। जबकि जिले में ऐसी तमाम अस्पताल हैं जहां बिना पंजीयन और एक्सरे टेकनीशियन के ही मरीजों को एक्सरे सुविधा प्रदान की जा रही है। मनीष पटैल की अथर्व क्लीनिक, मिशन हॉस्पिटल के साथ साथ जिले में कुकर मुत्तों की तरह एक्सरे सेंटर खुले हुए हैं। डॉ. रमेश बजाज द्वारा जहां चिकित्सा परामर्श दिया जाता है, वहीं उन्होंने अभी हाल ही में एक्सरे मशीन का भी संचालन प्रांरभ कर दिया है, जिसका चिकित्सा विभाग में कोई पंजीयन नहीं है।
जांच के नाम पर होती है खानापूर्ति
जिले में इन नर्सिंग होमों पर नियंत्रण रखने की जबाबदारी मुख्य जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी की है परंतु अपनी भ्रष्ट कार्यप्रणाली के लिए मशहूर जिला सीएमएचओ डॉ. अजय बड़ोनिया इन नर्सिंग होमों का नाम के लिए निरीक्षण करते हैं या करवाते हैं। वर्तमान में जांच कर रही टीम में डीएचओ डॉ. तुलसा ठाकुर, डॉ. संगीता त्रिवेदी, डॉ. प्रहलाद पटैल और डॉ. पीसी. स्वर्णकार हैं। उक्त टीम को शहर में संचालित सभी 14 नर्सिंग होम्स के निरीक्षण का दायित्व सौंपा गया था परंतु निरीक्षण दल ने दो चार नर्सिंग होम का निरीक्षण कर खानापूर्ति कर ली और बंद कमरें में बैठ जांच रिर्पोट भी तैयार कर ली। डॉ. संगीता त्रिवेदी के अनुसार सभी 14 नर्सिंग होम्स की जांच की गई और सभी नर्सिंग होम्स को नियुमानुसार सही पाया गया। लगभग अस्पतालों में जैविक कचरे को लेकर कमी पाई गई है जिसे दूर करने के लिए अस्पताल के संचालकों को नोटिस जारी किया जाएगा। नर्सिंग होम में संचालित बिना टेक्नीशियन के एक्सरे मशीन के संचालन तथा पेथोजॉली लैब न होने के बाद भी पैथोलॉजी होने की बात पर उन्होने कहा कि नर्सिंग होम में पैथेलॉजी लैब नहीं है कलेक्शन सेंटर हैं। निरीक्षण दल में शामिल डॉक्टर स्वयं ही निजी रूप से चिकित्सा व्यवसाय करते हैं। जहां डॉ. पी.सी. स्वर्णकार का स्वयं का पैथोलॉजी सेंटर हैं जहां अनुभवहीन और अनप्रोफेशनल लोग खून की जांच करते हैं। वहीं डॉ. संगीता त्रिवेदी सालोमन काम्पलेक्स में अपने निजी क्लीनिक का संचालन करती हैं। वहीं जिले में हो रहे चिकित्सा व्यापार पर लगाम लगाने वाले जिला चिकित्सा अधिकारी डॉ. अजय बड़ौनिया ने व्यस्तता का बहाना बनाते हुए कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।

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