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छठी तक पढ़ाई की, रामकथा पढ़ते-पढ़ते बन गई थी MP की CM

भोपाल। केंद्रीय मंत्री उमा भारती की मुश्किलें बढ़ सकती है। उन पर सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी विध्वंस मामले में केस चलाने की मंजूरी दे दी है। मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा के बारे में सभी लोग जानते हैं कि वे अक्सर अपने विवादित बयानों के कारण सुर्खियों में रहती हैं। उनका विवादों से चोली-दामन का साथ रहता है। छोटी-सी उम्र में साध्वी बनने के बाद वे राजनीति में आ गई। छठी तक पढ़ी यह महिला MP की CM रह चुकी हैं और आज देश की केंद्रीय मंत्री हैं।

वे बोलने में इतनी बेबाक हैं कि जब वे बोलना शुरू करती हैं तो अच्छे-अच्छे चुप हो जाते हैं। उनके तर्कों का बड़े-बड़े अफसर भी जवाब नहीं दे पाते हैं। आज उनके जन्म दिवस पर बधाइयों का तांता लगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी ट्वीट कर उन्हें जन्म दिवस की बधाई दी है।

छठी कक्षा तक पढ़ी-लिखी, बनीं MP की CM
-हिन्दू महाकाव्य में अच्छी पकड़ रखने वाली उमाश्री जन्म 3 मई 1959 को टीकमगढ़ के लोधी राजपूत परिवार में हुआ था।
- उमा मात्र छठी तक पढ़ी हैं। उमा का लाल-पालन ग्वालियर घराने की राजमाता विजयराजे सिंधिया ने की थी। वे ही उन्हें पार्टी में लेकर आई थीं।
-उमा एक आत्मविश्वासी राजनीतिज्ञ हैं। साध्वी की वेशभूषा में हमेशा रहने वाली उमा ने अविवाहित रहकर अपना जीवन धर्म को समर्पित कर दिया।

- 1984 में BJP से जुड़ गई और पहला चुनाव हार गईं।
- 1989 के चुनावों में फिर जोर आजमाया और वे जीत कर विधानसभा पहुच गईं।
-खुजराहो लोकसभा सीट से 1991 में चुनाव लड़कर वे चर्चाओं में आ गईं।

- उसके बाद तीन बार लगातार वे इसी सीट पर जीतती गईं। 1999 में भोपाल संसदीय सीट से लड़कर वे लोकसभा पहुंच गईं।
- वाजपेयी सरकार में उमा केंद्रीय मानव संसाधन, पर्यटन, खेल और युवा मामले, कोयला और खाद्यान्न मंत्रालय की मंत्री रहीं।
- वर्ष 2003 के चुनाव में उमा भारती के दम पर प्रदेश में भाजपा की सकरा बन गई। उमा ने दिग्विजय सिंह सरकार को बुरी तरह परास्त किया और वे MP की मुख्यमंत्री बन गईं।

- इसके बाद गलत बयानबाजी के कारण उमा की सदस्यता छिन गई और उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया। बाद में भारतीय जन शक्ति पार्टी बनाकर उन्होंने संघर्ष किया। उनके वापसी का दौर शुरू हुआ और वे केंद्रीय मंत्री हैं।

5 नवंबर 2008
तेज़ तर्रार नेता उमा ने छिंदवाड़ा में अपनी ही पार्टी के एक नेता की पिटाई कर दी थी। उन्होंने जमकर थप्पड़ जड़ दिए थे। इसके बाद कई अफसरों के साथ भी ऐसे ही व्यवहार के किस्से सुनने में आते रहे।

मशहूर है उमा का ये किस्सा
साध्वी उमा भारती आध्यात्म के रास्ते पर चलने से पहले कई लोगों को पसंद करती थीं। उन्होंने एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में कहा था कि वे BJP के पूर्व विचारक गोविंदाचार्य से प्यार करती थीं। उमा ने स्वीकार किया था, 'हां, मैं उनसे (गोविंदाचार्य) प्यार करती थी। मैं शादी करना चाहती थी। हर जगह मैं उनका पीछा करती थी और मुझे लगता था कि वे भी मुझे प्यार करते हैं।

इस साक्षात्कार से अलग हटकर भी भोपाल में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उमा ने स्वीकार किया था कि वह 1992 में गोविंदाचार्य से विवाह करने की तैयारी में थीं। उमा ने कहा था कि आडवाणीजी ने भी गोविंदाचार्य की उनसे शादी कराने की इच्छा बताई थी। लेकिन, उमा के भाई स्वामी लोधी ने यह कहते हुए मामला टाल दिया था कि गोविंदाचार्य सांवले (काले) हैं और आकर्षक नहीं। 1992 में आयोजित इस कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, गोविंदाचार्य, स्वामी लोधी और बड़ी संख्या में संवाददाता मौजूद थे।

उमा को प्रपोज कर चुके हैं गोविंदाचार्य
नागपुर में एक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में BJP के विचारक गोविंदाचार्य ने स्वीकार किया था कि उन्होंने उमा को विवाह के लिए प्रपोज कर दिया था। जब उनसे पूछा गया कि कोई पछतावा है तो उन्होंने कहा था कि उमा से रिश्ता मूर्त रूप नहीं ले सका था।

उमा के घर रहते थे गोविंदाचार्य
उमा ने एक कार्यक्रम में यह भी कहा था कि उन पर लगे वे आरोप सही हैं जिसमें कहा गया था कि गोविंदाचार्य उनके घर रहते हैं। उमा ने इस बात को विस्तार देते हुए कहा था कि जब मुझे बता चला कि उनका घर और गाड़ी छिन गई है तो उनसे संपर्क कर मैं अपने साथ ले आई। इससे पहले शीर्ष नेताओं से बात भी की थी।

इन प्रेमियों ने नहीं किया त्याग- धर
इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व जॉइंट डायरेक्टर एमके धर ने भी अपनी किताब में दोनों के प्रेम प्रसंग के बारे में अपनी किताब 'ओपन सीक्रेट्स' में लिखा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा विवाह की अनुमति न देने के कारण गोविंदाचार्य और उमा भारती को गहरा झटका लगा, जिससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इन प्रेमियों ने कोई त्याग नहीं किया, बल्कि राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण विवाह नहीं किया

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हम पत्रकार अक्सर दूसरों पर सवाल उठाते हैं, लेकिन कभी खुद पर नहीं, हम दूसरों की जिम्मेदारी तय करते हैं, लेकिन अपनी नहीं. हमें ‘लोकतंत्र का चौथा खंभा’ कहा जाता है. लेकिन क्या हम, हमारी संंस्थाएं, हमारी सोच और हमारी कार्य प्रणाली क्या है इसके बारे में सोचते हैं? यह सवाल सिर्फ मेरे लिए नहीं है हम सब के लिए है? पालन करना, न करना हर किसी का निजी मामला है लेकिन मेरा मानना है जो पर्सनल है वह प्रोफेशनल भी होना चाहिए। एक ऐसा वक्त आता है

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